कहीं शर्मसार हुई पत्रकारिता तो कहीं निकले इसके आंसू

गिद्ध और मरणासन्न बच्ची की तस्वीर सालों पुरानी साल 1993 की है जब सूडान में अकाल पड़ा था जोहान्सबर्ग दक्षिण अफ्रीका के जुनूनी फोटो जर्नलिस्ट केविन कार्टर अपने फोटोग्राफी के जूनून को आज़माने सूडान जा पहुचे थे वहां उनके दिमाग में शायद सिर्फ दुर्लभ तस्वीरें खींचने का ही जूनून था इसलिए मरणासन्न बच्ची की तरफ बढ़ते गिद्ध को रोकने बजाए उन्होंने अपना सारा ध्यान तस्वीरें खींचने में ही लगा दिया मगर परिणाम जब उनके सामने आया तो वो बर्दाश्त नहीं कर पाए , जब उन्होंने देखा की वो नरभक्षी परिंदा उस बच्ची के मांस नोच-नोच कर खा गया और वो अपने जूनून को पालते रहे, कुछ नहीं कर पाए इस घटना के अपराधबोध से ग्रस्त केविन गहरे अवसाद में चले गए बाद में शायद पश्चाताप के लिए उन्होंने खुद्कुशी कर ली इस तस्वीर को दुनिया भर में जहां फोटोग्राफी के जानकारों ने सराहा तो वही इसके मानवता को शर्मसार करते हिस्से के कारण इसकी भरपूर आलोचना भी हुई

दूसरी घटना सीरिया के अल्लापो शहर के नजदीक की है जहां आतंकवादियों ने चिप्स देने के बहाने बच्चों को अपनी गाड़ी के पास बुलाया और फिर बम ब्लास्ट कर 126 लोंगो की जान ले ली घटना में तक़रीबन 70-80 बच्चे भी मारे गए । इस घटना के तुरंत बाद वहां पहुंचे फोटो जर्नलिस्ट अब्द अल्कदर हबक ने जब ये खूनी खेल देखा तो बजाए घटना की तस्वीरें लेने के वो एक घायल बच्चे को गोद में लेकर आपातकाल सेवा के लिए भागे


अब्द ने अपने इंटरव्यू में बताया की रास्ते भर वो घायल बच्चा एक टक उनकी आँखों में देखता रहा, अब्द कहते है की उन्हें नहीं पता की अब वो बच्चा जिंदा है या नहीं मगर अपने सामने इस तरह बच्चों के शव देखकर, उन्हें तड़पता देखकर वे बुरी तरह टूट गए। कहीं अपने आंसू नहीं रोक पाए. ऐसी घटनाएँ किसी को भी विचलित कर सकती है बड़ा कलेजा चाहिए होता है पत्रकारिता में फिर वो काम लिखने का हो या तस्वीरों के ज़रिये किसी का दर्द बयाँ करने का
#हिंदी_ब्लोगिंग 



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