ये घोड़ा आपका है इसके इस्तेमाल से मत डरिये

दोस्तों अक्सर ऐसा देखने को मिलता है कि इंसान अपनी पसंद के जरूरत के बहुत से काम सिर्फ ये सोचकर नहीं करता कि दुनिया क्या सोचेगीपास-पड़ोस के लोग क्या कहेंगे। दरअसल अपने दैनिक जीवन में   हम  जितने तरह के लोगों से मिलते है उन सबके विचार हमारे प्रति अलग-अलग होते है। इन्हीं पराये विचारों के दबाव में आकर हम अपना आत्मविश्वास खो देते है, और न चाहते हुए भी गलत निर्णय ले लेते है। आज की ये कहानी ऐसे ही पिता-पुत्र के सफर से जुड़ी हुई है जहां दोनों पिता-पुत्र अनजाने लोगों की बातों में आकर बेवजह अपने सफर का आनंद गवां देते है।


एक बार पिता-पुत्र का एक जोड़ा व्यापार के सिलसिले में अपने  एक पालतू घोड़े पर सवार होकर घर से निकलता है। रास्ते में वे दोनों कई अनजान शहरों से गुजरते है। मार्ग में जब वे चाय-नाश्तें के लिए एक  अनजान नगर में रूकते है तो एक अपरिचित व्यक्ति उन्हें टोक कर कहता है कि भाई आप कैसे कठोर लोग है। एक बेचारे बेज़ुबान जानवर पर दो-दो लोग सवार है ये भी भला कोई बात हुई, शर्म करो।

उसकी बातों से वे दोनों पिता-पुत्र स्वयं को दोषी मानकर फटाफट घोड़े से उतर जाते है। उसके बाद अपने बेटे के कहने पर बुर्जुग पिता घोड़े पर सवार हो जाते हैं मगर फिर जब वो अगले दिन एक नए नगर को पहुंचते है तो वहां कुछ लोग उस बुर्जुग को टोकते हुए कहते है कि भाई रहम खाओ इस नौजवान पर माना कि तुम्हारी उम्र हो रही है मगर ये युवक भी तो इंसान है। बेचार कब तक यूं पैदल चलेगा शर्म करो उतरो इस घोड़े से और इस बेचारे युवक को घोड़े की सवारी करने दो।


पिता के कहने पर एवं काफी मान-मनौव्वल के बाद बेटा अकेले घोड़े पर सवार हो जाता है। आगे मार्ग में फिर कुछ गांववाले उन्हें आते दिखाई देते है। बड़ी देर तक उन दोनों बाप-बेटे को निहारने के बाद उनमें से एक व्यक्ति ताना मारते हुए कहता है कि  देख लो भाई क्या ज़माना आ गया है।  बुर्जुग पैदल चल रहे है और हटटा-कटटा नौजवान घोड़े पर सवार है। उसकी ये बातें सुनकर नौजवान काफी शर्मिदा   हो जाता है और तुरंत ही घोड़े से उतर जाता है। दोनों पिता-पुत्र लोगों की बातों को काफी गंभीरता से लेते है।


अंततः ये निर्णय होता है कि अब दोनों में से कोई भी घोड़े पर नहीं बैठेगा। घोड़े की लगाम हाथ में लिए थके-हारे दोनों किसी तरह अपना सफर तय करते है। रास्ते में जब विश्राम के लिए वो एक मंदिर के प्रागंण में रूकते है तब वहां के पुजारी उनसे उनकी दयनीय स्थिती का कारण पूछते है एवं उत्तर मिलने पर उनसे कहते है तुम्हारा ये घोड़ा अभी जवान एवं तंदरूस्त है और फिर भी तुम उसका उपयोग कर पाए। अपने डोलते आत्मविश्वास के कारण तुम दूसरों की बातों में आ गए। ऐसे लोगों की बातों में जो न तुम्हें जानते है न ही तुम्हारें जवान एवं तंदरूस्त घोडे़ के बारे में फिर भी तुमने उनकी बात मानी स्वयं पर भरोसा नहीं किया क्यों?  जरा सोचों, तुम दोनों पैदल-पैदल ही अपना सफर तय कर रहे। उनकी ये बातें एक बार फिर उन दोनों को तीर सी चुभती है। मगर साथ ये भी समझ नहीं आ रहा होता कि आखिर अलग-अलग नगर में मिले भिन्न-भिन्न लोगों में से कौन सहीं था और कौन गलत। किसका कहा उन्हें मानना चाहिए था और किसकी बातों को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए था।
 

दोस्तों ऐसा अक्सर हमारे साथ भी होता है और खासकर उन लोगों के साथ कुछ ज्यादा ही होता है जिन्हें खुद के किये पर अपने निर्णय पर स्वयं संशय होता है। जिन्हें इस बात की खासी चिंता रहती है कि लोग क्या सोचेगे,   कहीं कोई उनके इस निर्णय का बुरा तो नहीं मान लेगा। इन सभी पसोपेश में वे अपने विवेक का इस्तेमाल करना भूल जाते है। जो कि उनके लिए नुकसानदेह साबित होता है। ऐसे में जरूरी है कि हम किसी भी काम को करते वक्त अपने आत्मविश्वास को न खोए। किसी की बातों में आने की बजाए अपने विवेक का इस्तेमाल करें। वरना हमारे पास जरूरत का सामान होते हुए भी कष्ट सहना पड़ सकता है ठीक वैसे ही जैसे इस कहानी के किरदारों के पास घुड़सवारी की सुविधा होते हुए भी कभी एक को तो कभी दोनों को कष्ट झेलना पड़ा।

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