कद में छोटे मगर शख्सियत में सबसे ऊँचे शास्त्री जी

आज देश के तीसरे और मेरे सबसे प्रिय प्रधानमंत्री, राजनेता लाल बहादुर शास्त्री जी का जन्मदिन है। वो प्रधानमंत्री जिसने सच में जिसने सादा जीवन उच्च विचारके नारे को देश के सबसे बड़े पद पर पहुंचने के बाद भी नहीं छोड़ा। तकरीबन 5 फुट का कद और मात्र 39 किलो का वजन मगर जज्बा ऐसा कि 56 इंच की छाती वाले भी शर्मिदा हो जाए। आइये जानते है शास्त्री जी के जीवन दरअसल सादे जीवन के कुछ यादगार सुने-अनसुने किस्सों के बारे में-

2 अक्टूबर 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराए में स्कूल शिक्षक शारदा प्रसाद श्रीवास्तव के यहां हुआ था उनके पिता एक सरकारी शिक्षक और मां एक सामान्य गृहणी थी। बाद में उनके पिता का हस्तांतरण राजस्व विभाग इलाहाबाद में क्लर्क के पद पर कर दिया गया। शास्त्री जी जब मात्र 18 महीने के थे तब ही अप्रैल 1906 में उनके पिता का प्लेग के कारण स्वर्गवास हो गया। इसके बाद वे अपनी मां रामदुलारी एवं एक बहन के साथ रहने के लिए अपने नाना हजारी लाल के गांव रामनगर चले गए। मगर दो साल बाद साल 2008 में नाना की मृत्यु के बाद उनका जीवन और कठिन हो गया। पालन-पोषण की पूरी जिम्मेवारी मामा दरबारी लाल पर आन पड़ी।

पूरी रात में छाप डाली किताब-

पैसों की कमी के कारण जहां वो नाव की सवारी से बचने के लिए हर रोज तैरकर गंगा पार कर स्कूल जाते थे वहीं शास्त्री जी स्कूल की सभी किताबे खरीद पाने में असमर्थ थे। ऐसे में स्कूल में वो अक्सर अपने दोस्तों की किताबों से सहायता लिया करते थे। मगर स्कूल में नए आए अंग्रेजी के शिक्षक को इस बात का कोई ज्ञान नहीं था। इसलिए उनके पास अपनी किताब न पाकर अंगे्रजी के शिक्षक ने उनकी पीटाई कर दी साथ ही से भी कह दिया की कल स्कूल किताब लेकर ही आना। शास्त्री जी जानते थे कि वो किताब तो नहीं ही खरीद पाएंगे इसलिए उन्होंने दोस्त से उसकी किताब उधार ली और रातों-रात पूरी किताब हाथों से कापी कर ली। दूसरे दिन जब मास्टर ने पूछा तो उन्होंने पूरी बात बताई उनकी इस प्रतिभा से अंग्रेजी पढ़ाने वाले मास्टर काफी प्रभावित हुए एवं हर स्तर पर उनका मार्गदर्शन करने लगे।

मां की डांट और गांधी जी से मुलाकात-

उन दिनों पूरी देश स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में लगा हुआ था मगर शास्त्री जी की माताजी चाहती थी कि उनके नन्हें को एक ढंग की नौकरी मिल जाए। कठिनाइयों भरा जीवन जी रहे शास्त्री जी भी यही चाहते थे इसके लिए उन्होंने अपने ममेरे भाई के साथ मिलकर रेलवे में क्लर्क की नौकरी की परीक्षा भी दी मगर किस्मत ने साथ नहीं दिया और शास्त्री जी परीक्षा पास नहीं कर पाए। जबकि उनके ममेरे भाई को रेलवे में क्लर्क की नौकरी मिल गई। दुखी, गुस्साई मां ने उन्हें बहुत डांटा परेशान शास्त्री जी को भी अपना भविष्य समझ नहीं आ रहा था उन्हीं दिनों नेटाल से लौटे महात्मा गांधी जगह-जगह सभाए कर रहे थे। साल 1921 में गांधी एवं महामाना मदनमोहन का एक ऐसी ही सभा जिसमें गांधी छात्रों से पढ़ाई छोड़ उनके साथ होने का अहवान कर रहे थे उनके भाषण से प्रभावित होकर शास्त्री जी आजादी की लड़ाई में उनके साथ हो लिए।

व्यक्तिगत रिश्तों भी निभाए खुददारी से-

साल 1927 में उनका विवाह ललिता देवी से हुआ ससुर के दहेज देने का उन्होंने जमकर विरोध किया और सिर्फ एक जोडे़ खादी को ही स्वीकारा। वहीं एक बार जब वो जेल में बंद थे तब उनसे मिलने आई ललिता देवी ने उन्हें दो आम दिए तो शास़्त्री जी उनका विरोध ये कह कर दिया की कैदियों के लिए बाहर की चीजे लाना कानूनन अपराध है। ऐसे ही जब वो एक बार दोबारा जेल में बंद थे और उनकी बेटी काफी बीमार थी तो उन्हें 15 दिनों की पेरोल पर छोड़ा गया मगर जल्दी ही उनकी बेटी की मृत्यु हो गई तब शास़्त्री जी ने अपनी जमानत इसलिए वापस ले ली की अब उन्हें इसकी कोई जरूरत नहीं।

जिसे रेलवे ने नौकरी नहीं दी वो देश का पहला रेलवे मिनिस्टर बना गया-

बतौर रेलमंत्री शास्त्री जी ने जब पहली प्रेस कांफ्रेस की तब उन्होंने अपनी माता जी याद करते हुए पत्रकारों को बताया कि उनकी मां रेलवे में उनकी नौकरी न लगने से काफी दुखी थी एवं मां की डांट से वे भी बहुत क्षुब्ध थे मगर देखिये न मुझे पता था न ही मेरी मां को कि जिसे रेलवे ने क्लर्क की नौकरी नहीं दी वो एक दिन आजाद हिन्दुस्तान का पहला रेलवे मिनिस्टर बन जाएगा।

पहले कश्मीर में नेहरू के कोट से चलाया काम फिर ताशकंद में छोटा करवा के पहना-

दिसम्बर 1963 की बात है कश्मीर, श्रीनगर में स्थित हजरत बल दरगाह से मोहम्मद साहब के रखे बाल के चोरी हो जाने की अफवाह उड़ी। पूरे कश्मीर में तनाव था प्रधानमंत्री नेहरू ने शास्त्री जी को वहां जाकर मामला समझने सुलझाने को कहा। दिसम्बर की जानलेवा ठंड में शास्त्री जी दो जोड़ी साधारण कपड़ों संग कश्मीर रवाना होने को तैयार थे तब नेहरू ने उनसे उनके गर्म कपड़ों के बारे में पूछा इस पर शास्त्री जी ने जवाब दिया ‘‘मैं वहां घूमने नहीं जा रहा हूं।‘‘ जबकि उनके पास कोई कश्मीर की सर्दी से निबटने के लिए गर्म कपड़ा था ही नहीं। ऐसे में नेहरू ने उन्हें अपना एक लांग कोट दिया तब शास्त्री जी ने आप काफी लम्बे है ये मुझे बड़ा होगा। इसपर नेहरू ने समझाया कि वहां के लोग ऐसे ही लम्बे कोट पहनते है। बाद में वापस आकर उन्होंने नेहरू का कोर्ट उन्हें वापस करना चाहा जिसे नेहरू ने उन्हें भेंट स्वरूप रख लेने का कह दिया।

सन 1966 में जब बतौर प्रधानमंत्री शास्त्री जी को ताशकंद जाना था। तब उनसे नया कोर्ट बनवाने को कहा गया। मगर सन 1965 में पडे़ सूखे से एवं पाकिस्तान के साथ हुई जंग से देश की माली हालत ठीक नहीं थी इसलिए उन्होंने नया कोर्ट लेने की बजाए नेहरू के दिए कोर्ट को ही छोटा करने का आदेश दे दिया और उसे ही पहन कर वो उस ऐतिहासिक समझौते में चले गए।

आपका प्रधानमंत्री सिर उठा के बात करेगा और पाकिस्तान का राष्ट्रपति सिर झुका के-


वहीं एक और दिलचस्प किस्सा जो ताशकंद समझौते से जुड़ा है कि जाने से पहले जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि आप जरनल अयूब खान से कैसे बात करेंगे वो तो काफी लम्बे है इस पर शास्त्री जी ने पत्रकार के सवाल का जवाब देते हुए कहा आप परेशान न हो। आपका प्रधानमंत्री सिर उठा के बात करेगा और पाकिस्तान का राष्ट्रपति सिर झुका के।

मीडिया में नाम आने से था खासा परहेज-

शास्त्री जी भले ही 18 महीनों के देश के प्रधानमंत्री रहे मगर उनकी अनेकों उपलब्धियां रही है। एक बार उनके एक मित्र ने उनसे इसी बावत सवाल पूछा की आप मीडिया में अपना नाम छपवाने से क्यों कतराते है। इस पर उन्होंने ताजमहल का उदाहरण देते हुए कहा कि ताजमहल में दो तरह के पत्थर लगे है एक वो उपर चमचमाते हुए जिसे सभी देखकर खुश होते है दूसरे वो जिनकी बुनियाद पर ताजमहल खड़ा है जिसका योगदान अक्सर सभी भूल जाते है। मगर सच यही है कि ताजमहल की बुनियाद उन्हीं गुमनाम पत्थरों पर टिकी है मुझे आप ऐसे ही  गुमनाम पत्थर रहने दें।

अठन्नी के लिए टांगेवाले से लड़ाई फिर कार के लिए लिया बैंक लोन-

शास्त्री जी का जीवन सत्य में काफी साधारण था प्रधानमंत्री बनने तक उनके पास न स्वयं का घर था न ही अपनी कार। ऐसे में एक दिन जब वो टांगे से कही जा रहे थे तब अंजान टांगे वाले ने उनसे ज्यादा पैसे वसूलने चाहे। शास्त्री जी जानते थे कि उनका किराया डेढ़ रूपये बनता है जबकि टांगेवाला दो रूपये लेने पर अड़ा हुआ था। बीच सड़क पर पचास पैसे को लेकर बहस होती देख भीड़ जमा हो गई। तब लोगो ने उन्हें पहचान लिया और टांगे वाले ने भी माफी मांगी।

हालांकि उसके बाद शास्त्री जी जब प्रधानमंत्री बने तब सबने कहा कि अब आपके पास अपनी कार होनी चाहिए। शास्त्री जी ने बैंक खाते में देखा तो मात्र 7000 रू थे। वहीं फिएट कार का मुल्य 12000 रू था इसके लिए उन्होंने पंजाब नेशनल बैंक से 5000 का लोन लिया। हालांकि लोन की किस्त पूरी होने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई मगर उनकी पत्नी ने अपनी पेंशन से इस कार का बैंक लोन चुकाया। आज भी उनकी वो फिएट कार DLF-6 दिल्ली स्थित लाल बहादुर मेमोरियल में रखी हुई है। 

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