ज़िक्र 84 दा, साड्डे दिल चे वस्सी उदासी दा


सन 1984 के सिख विरोधी दंगों में बहुत से सिख परिवारों को बर्बाद कर दिया था। दिल्ली और उत्तर भारत के बाकी इलाकों से आए दिन सिखों की निर्मम हत्याओं की ख़बरें अख़बारों में भी छपती रही। मगर देश की राजधानी से कोसों  दूर मेरे शहर जमशेदपुर के सिख समुदाय ने कैसे अपना ये वक़्त गुज़ारा इसके किस्से मुझे मेरे घर के बड़ों ने सुनाए थे। दो दिनों पहले जब सिख दंगों के एक मुख्य आरोपी सज्जन कुमार को दिल्ली हाईकोर्ट ने इस घटना का दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सज़ा सुनाई तो पुराने ज़ख्म हरे हों गए। 



मेरे जैसे कानून को जानने-समझने वाले इस सज़ा को सुनकर भी इसलिए नहीं खुश हैं क्योंकि अभी भी देश के  सबसे बड़े कोर्ट की इस मामले से जुड़ी सुनवाई बाकी है। पता नहीं वहाँ से कब और क्या फैसला आएगा और उन दंगों में अपना सबकुछ गवां चुके कितने लोग उसे सुन पाएंगे। क्योंकि 39 साल की उम्र में जिस सज्जन कुमार ने ये कांड किया था उसे तो उसके कुकर्मों  की सज़ा 73 साल में मिल रही है जब वो ऐसे भी मरने ही वाला है।       

बात सन 1984 के सिख दंगों की! मेरे शहर जमशेदपुर में भी मौजूद सिख/पंजाबी समुदाय देश के बाकी शहरों/राज्यों के सिखों की तरह दहशत में थे। हर तरफ सिखों को खोज-खोजकर उनका क
क़त्लेआम करने की एक ज़हरीली हवा तेज़ी से बह रही थी।

उस वक़्त जमशेदपुर सिंहभूम जिले का हिस्सा था जो आजके (पूर्वी सिंहभूम एवं पश्चिमी सिंहभूम) में विभाजित है। तक़दीर से उस जिले के कलेक्टर भी एक सिख आईएएस जीएस कांग साहब थे। कांग साहब बाद में नितीश कुमार की सरकार में विभाजित बिहार के चीफ सेकेट्री भी बने थे।


दंगों के दौरान जमशेदपुर के सिख कितने खौफज़दा थे कांग साहब को भी इसका अंदाजा नहीं था। मगर एक दिन दंगों के दौरान जैसे ही कांग साहब की सरकारी एम्बेस्डर गाड़ी जमशेदपुर शहर के बीच पहुँची। दंगाइयों ने गाड़ी में बैठे सिख को कोई आम सा सिख समझकर घेर लिया। दंगाई हथियारों के साथ उनकी गाड़ी पर हमला करने ही वाले थे कि पीछे से उन्हें स्काउट करती हुई पुलिस एवं पैरामिलिट्री की गाड़ियां वहाँ आ पहुँची।

पुलिस एवं पैरामिलिट्री की गाड़ियां देख घबराएँ दंगाइयों ने वहाँ से भागने में वक़्त नहीं लगाया। वहीं अपने साथ हुई इस अप्रत्याशित घटना के बाद कांग साहब को शहर के हालात समझते देर न लगी। उन्होंने तुरंत अपने मातहत अधिकारियों को आदेश देकर ये पता लगाने को कहा कि शहर में कितने गुरुद्वारे हैं और जमशेदपुर में सिख/पंजाबी समाज कहाँ-कहाँ रहता है।

चंद ही घंटों में कलेक्टर के आदेश पर जमशेदपुर के उन सभी मोहल्लों एवं गुरूद्वारों को फ़ोर्स की सुरक्षा मिल गई जहाँ-जहाँ सिख/पंजाबियों की बसाहट थीं। तो, कुछ इस तरह जमशेदपुर के सिख/पंजाबी समाज को किसी तरह सुरक्षा मिल पाई थी।


घरवाले बताते हैं कि उस दौरान हमारे मोहल्ले में सिर्फ चार घरों में टीवी थी, शाम होते ही उन घरों के बाहर लोगों का जमावड़ा लग जाता सभी पंजाबी में एक दूसरे से बात करते थें। दिल्ली के बिगड़ते हालत से हर कोई खौफ़ में था इसलिए महिलाओं और बच्चों को घर में बंद कर दिया जाता था। नौजवानों की ड्यूटी कॉलोनी के हर मुख्य प्रवेशद्वार पर हथियारों (डंडों और तलवारों) के साथ लगा दी गई थीं। वे सारी-सारी रात जागकर पहरा देते थे ताकि कोई दंगाई, कोई मौकापरस्त बदलती फिज़ा का फ़ायदा लेने की कोशिश न कर पाएं। इस दौरान ठंड से बचने के लिए वो रातभर अलाव जलाकर रखते थें।     


ज़्यादातर बुज़ुर्ग कॉलोनी के घरों की ऊँची-ऊँची छतों पर रातभर डटें रहते। कुछ के पास दोनाली बंदूके थी। ये बंदूके उस वक़्त पूरे मोहल्ले को हिम्मत देने के काम आई थीं। रात में रुक-रुक कर किसी न किसी छत (जो उस वक़्त रक्षा में तैनात स्नाईपर्स) का ठिकाना बन चुकी थी, से एयर फायरिंग की आवाजें आती रहती थी, ताकि कोई भी दंगाई/मौकापरस्त किसी गलत इरादें से कॉलोनी में घुसने की हिम्मत न कर पाएं।


मेरे एक जाननेवाले ने मुझे अपने मोहल्ले का एक और किस्सा भी सुनाया था। जमशेदपुर के उस मोहल्ले में सिख/पंजाबी न के बराबर रहते थे। मगर एक सरदारजी वहाँ सालों से अपनी तीन जवान बेटियों और बीवी के साथ रहते थे। अगर आपको पुराने घरों की बनावट के कुछ आईडिया होगा तब आप जानते होंगे कि पहले के घरों में, दो घरों के बीच दीवारें न होकर एक अंदरूनी दरवाज़ा होता था। मेरे उस जानने वाले के घर में भी एक अंदरूनी दरवाज़ा था जिसका दूसरा छोर उस सरदारजी के घर की ओर खुलता था।

दंगे के दौरान एक रोज़ मोहल्ले के कुछ असामाजिक तत्वों ने उसे और उसके बड़े भाई को सड़क पर घेर लिया। उनका टारगेट सरदारजी के घर में लूटपाट करनी थी। उन लोगों ने मेरे जाननेवाले और उसके भाई को बड़े ही प्यार से कहा कि "हमें पता है कि तुम्हारे और सरदार जी के घर के बीच भी एक अंदरूनी दरवाज़ा है। किसी को कुछ पता नहीं चलेगा, हमलोग रात को आएँगे तुम बस दरवाज़ा खोल देना बाकी हम देख लेंगे।"


सरदारजी और मेरे परिचित के परिवार का सालों का साथ था। वो कैसे इस तरह की घिनौनी हरकत में उन गुंडों के पाप के भागीदार बन सकते थे। मगर वहीं उन्हें ये बात भी डरा रही थी कि अगर उन्होंने गुंडों की बात नहीं मानी तो उनका गुस्सा उसके परिवार पर भी निकल सकता है।

दोनों भाई इसी कशमकश में घर पहुँचे और पूरी बात अपने माता-पिता को बताई। पूरा परिवार धर्म संकट में फंस गया कि करें तो करें क्या? आखिरकार उन्होंने इस बावत सरदारजी से बात करने का मन बनाया और उनके घर चले गए। मोहल्ले के उन गुंडों की साज़िश के बारे में जानकार सरदारजी के हाथ-पाँव फूल गए उन्हें समझ नहीं आया कि वो क्या करें !


आखिरकार दोनों परिवारों ने मिलकर किसी तरह सरदारजी के परिवार के सभी ज़रूरी बंधवाएं और फिर किसी तरह सूरज ढलने से पहले उस सिख परिवार को उनके रिश्तेदारों के वहाँ पहुंचवाया। रात वो गुंडों की फौज अपने कहे अनुसार मेरे उस परिचित के घर आ धमकी मगर वक़्त रहते समझदारी और हिम्मत से काम लेने से सरदारजी का कम से कम नुकसान हुआ।                         


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