अल्लाह के नाम पर या मुल्ला के नाम पर ?


ज़ायरा वसीम जब फिल्मों में आयी थी तो ये उसकी मर्ज़ी थी। अब अगर वो फिल्मों में काम नहीं करना चाहती तो उसके फैसले का सम्मान होना चाहिए, न कि उसके फैसले पर स्टुडियो वाली अधकच्ची जानकारी के आधार पर मुर्गा लड़ाई आयोजित कर टीआरपी बढ़ाने का बेशर्म काम किया जाना चाहिए।

हालांकि अगर हम अपने आस-पास झांके तो हमें आपने आस-पास अल्लाह के ऐसें हज़ारों बंदे मिल जाएंगे जो दिनभर, 5 वक़्त की नमाज़ में अल्लाह से उनके लिए एक बार बॉलीवुड के रास्ते खोल देने की दुआ करते रहते हैं।



जबकि ज़ायरा वसीम की गलती ये  है कि वो बॉलीवुड को छोड़ने को लेकर कोई तर्कसंगत ठोस जवाब नहीं दें पायी जिससे कि उसके इस निजी फैसले पर कोई सवाल न उठे। दरअसल सही मायने में तो उसे किसी तरह का जवाब या सफाई देने की ज़रूरत थी भी नहीं।  कि, वो अपनी जिंदगी में आगे क्या करना चाहती है। लेकिन शायद ज़ायरा ने उम्र और तजुर्बे के कच्चेपन में ये एक चाही-अनचाही गलती कर दी।

उसने जिस तरह से अपने फैसले को धर्म, मज़हब से प्रभावित होकर लेने की बात कही वो बात कईयों के गले नहीं उतर रही। क्योंकि, बॉलीवुड में आजतक अगर किसी धर्म-जात या मज़हब के लोगों का राज रहा है तो उसमें पंजाबी, बंगाली के अलावा उसके ही मज़हब के लोग सबसे ज़्यादा संख्यां में हैं।आप चाहें तो आंकड़े निकालकर देख लीजिए।

ऐसें में ज़ायरा के हिसाब से अगर इस्लाम और शरियत बॉलीवुड में काम करने को अपने मज़हब  के ख़िलाफ़ मानते है तो जो मुसलमान इस काम को पीढ़ियों से करते आ रहें हैं क्या वो सब इस्लाम के ख़िलाफ़ हैं? क्या ज़ायरा का यह तर्क दिलीप कुमार, कादर खान, के आसिफ़, कमाल अमरोही, मधुबाला, सायरा बानो, महमूद जैसे पुराने एवं आज की पीढ़ी के शाहरुख़ खान, सलमान खान, ज़ायरा के अपने गॉड फादर आमिर खान एवं तब्बू जैसे उम्दा भारतीय कलाकारों को कटघरे में खड़ा नहीं करता है?

क्या ज़ायरा वासीम के इस फैसले को निजी फैसला कम और इस्लाम के उस काल्पनिक और अव्यवहारिक विचार से ज़्यादा जोड़कर देखना गलत होगा, जिसके अनुसार हर मुसलमान अपनी ज़न्नत की सीट को कन्फर्म करने के लिए मज़हब की कैद से बाहर निकलना ही नहीं चाहता है ?


जहाँ जिंदगी के हर फैसले में धर्म- मज़हब आम इंसानों की जिंदगी इस तरह हावी हैं जिसमें एक मोबाइल, क्रेडिटकार्ड जैसी रोज़मर्रा की ज़रुरतों के सामान के इस्तेमाल करने से लेकर लड़कियों के जींस पहनने और खुद के भविष्य के लिए सुरक्षा के लिए इंश्योरेंस ख़रीदने तक को फ़तवा जारी कर हराम बताया गया है?


अच्छा होता कि ज़ायरा अपने इस निजी निर्णय को निजी ही रखती। न वो इस तरह छ: पन्नों की कोई चिट्ठी लिखती और न ही उसका या उसके धर्म का मज़ाक बनता। क्योंकि एक सेलिब्रिटी के तौर पर वो हमेशा मीडिया के निशाने पर होती हैं और किसी भी सेलिब्रिटी का जीवन निजी कम और सार्वजनिक ज़्यादा होता है। ऐसे में बहुत कम फैन्स होते हैं जो किसी सेलिब्रिटी को उसके धर्म के आधार पर पसंद या नपसंद करते हों।

किसी भी  फैन के लिए उसका पसंदीदा कलाकार, क्रिकेटर, संगीतकार, गायक इसलिए पसंदीदा होता है क्योंकि वो धर्म के घेरे से परे जाकर अपनी कला के बल पर लोगों के बीच प्यार-मोहब्बत बांटता है और रिश्तों को मजबूत करने का  काम करता है जिसमें शायद ज़ायरा चूक गई।




No comments