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एच1 एन1 इन्फ्लुंज़ा- जिसने लील ली थीं करोड़ों जिंदगियां !

कोरोना से संकटग्रस्त पूरी दुनिया के मौजूदा हालात को देखकर ऐसा लगता है जैसे हम सभी हॉलीवुड की कोई साइंस फिक्शन/सस्पेंस थ्रिलर फ़िल्म देख रहे हों। जिसमें कुछ इंसानों की गलती का खामियाज़ा पूरी मानव जाति के अस्तित्व पर संकट बन मंडरा रहा हो।  

जिसमें हर इंसान अब इस डर के साथ अपनी जिंदगीं काट रहा हो कि अगला नंबर उसका ही लगने वाला है। हम रोज़ाना जिंदगी से एक दिन और, एक दिन और उधार मांगकर जी रहे हों। ऐसे में पता नहीं कब जिंदगी हमें ये उधार देना बंद कर दें, कब एक छोटी सी गलती हमें उस संकट के और नजदीक ले जाए जहाँ से वापस जिंदगी का रास्ता फ़िलहाल खोजे नहीं मिल रहा।  
लेकिन सच तो ये है कि न ही ये कोई बुरा सपना है और न ही हम हॉलीवुड की कोई साइंस फिक्शन/सस्पेंस थ्रिलर फ़िल्म। देख रहें हैं। बल्कि ये मानव सभ्यता का वो एक कड़वा सच है जिसे लगभग पूरी मानव जाति भोग रही है। वहीं जो लोग फ़िलहाल इससे बचें हुए हैं वो भी डरे हुए हैं। क्योंकि कोई नहीं जानता कि ये अदृश्य बीमारी कब दबे पाँव उनके दरवाज़े पर दस्तक दे दें।  



ऐसे में सवाल ये है कि क्या मानव सभ्यता के इतिहास में ऐसी भयंकर घटना पहली बार घट रही है, या इससे पहले भ…
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हंगामा क्यों है बरपा, पूछताछ ही तो की है ?

अर्णव गोस्वामी के अलावा भी पूरे देश में ऐसे सैकड़ों पत्रकार हैं जो अपना काम बड़ी मेहनत और ईमानदारी से करते हैं। हाँ ये अलग बात है कि वो इतने रसूखदार नहीं हैं कि किसी नेता, मंत्री या राजनीतिक दल या देश की मीडिया ये मठाधीशों को उनकी चिंता हो। ताज़ा उदहारण के तौर पर याद कीजिये उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर के सामान्य से पत्रकार पवन जायसवाल को, जिसे स्थानीय प्रशासन द्वारा इसलिए प्रताड़ित किया गया, उसपर मुकदमा कर दिया गया। क्योंकि उसने अपनी एक ग्राउंड रिपोर्ट में मिडडे मील के नाम पर सरकारी स्कूल के बच्चों को नामक रोटी परोसने की घटना को उजागर किया था। न कि स्टूडियो में बैठकर कोरे आरोप लगाए थे। ऐसी स्पष्ट और साहसिक पत्रकारिकता करने वाले मीडियाकर्मी के लिए क्या किसी बड़े पत्रकार ने, मीडिया के मठाधीश ने इंसाफ दिलाने के लिए कोई पहल की ?

ऐसे में अर्णव गोस्वामी का पक्ष लेने वाले पत्रकारों, नेताओं आदि को ये याद रखना चाहिए कि, अर्णव पूरे भारतीय मीडिया या भारतीय पत्रकारों का प्रतिनिधि नहीं है। साथ ही वर्तमान में वो एक बड़े मीडिया हाउस के मालिक भी हैं इसलिए इस बात से कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि उनका इन्ट्रे…

गूगल ने इस ऐप की सेवा लेनी बंद कर दी है, आप भी बंदकर दीजिये!

ज़ूम ऐप नाम तो सुना ही होगा आपने! पूरी दुनिया मेंकोरोनासंक्रमण के कारण जब लोगों के कामकाज में दिक्कतें आने लगी। तो, वर्क फ्रॉम होमया बाक़ी ऑनलाइन कामों के लिए दुनियाभर के लोगों ने एक दूसरे से जुड़ने के लिएज़ूम ऐपका सहारा लेना शुरू कर दिया। जिससे न ही सिर्फ़ इस ऐप के यूज़र्स/डाऊनलोड्स की संख्या में बेतहाशा बढ़ोतरी दर्ज की गई। बल्कि ज़ूम ऐप बनाने वाली कंपनी के सीईओएरिक युआनकी कमाई में भी बेतहाशा वृद्धि देखने को मिली।लेकिन अब इस ऐप को लेकर रोज़ाना जिस तरह के ख़ुलासे सामने आ रहे हैं वो डराने वाले हैं, वो चौकाने वाले हैं साइबर सुरक्षाके विशेषज्ञों के हिसाब से इस ऐप पर यूज़र का डाटा बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं है।



यानी अगर आप इस ऐप को अपने मोबाइल फोन के ज़रिए इस्तेमाल में लाते हैं तो ये आपके मोबाइल फोन के डेटाकी सेंधमारी कर सकता है। वहीं अगर आप इसे अपने लैपटॉप/डेस्कटॉप के ज़रिए इस्तेमाल में लाते हैं तो ये आपके लैपटॉप में मौजूद सारा डेटा उड़ाकर किसी भीहैकरतक पहुंचा सकता है। गूगल जैसी टेक विशेषज्ञ कंपनी भी न जाने कब इसअसुरक्षितऐप के जंजाल में फंस गई। लेकिन अब जब इस बात की पुष्टि हो गई है कि ये ऐप ऑनलाइन सुरक्षा …

खुद से प्यार करना भी है बेहद ज़रूरी…

खुद को प्यार करना हमारे जीवन की संजीवनी है। इसके बाद ही आप खुले दिल से किसी और को प्यार करने में सक्षम हो पाएंगी। हम दूसरों से तो आसानी से प्यार कर लेते हैं लेकिन शीशे के सामने खड़े होने पर जो चेहरा हमारी ओर ताकता है उसे प्यार करना आसान नहीं। हम यह भी जानते हैं कि हमें खुद से मोहब्बत करनी चाहिए लेकिन अक़्सर हम ऐसा करने में कामयाब नहीं हो पाते




कई लोग होते हैं जो खुद को बिल्कुल बेकार समझते हैं। उन्हें यही लगता है कि उनसे कुछ नहीं हो पाएगा। कुछ गलत हो जाए तो वो खुद को जिम्मेदार ठहराते हैं। उनके मन में खुद के लिए इतनी नकारात्मकता इसलिए है, क्योंकि वो खुद से प्यार नहीं करते हैं।

खुद से प्यार कैसे करें और कितना ज़रूरी है बता रहे हैं रेकी ग्रांड मास्टर कैलाश रोहिडा। मुझसे लोग प्यार नहीं करते, क्योंकि मैं सुंदर नहीं दिखते, मेरा रंग काला है... इस तरह की बातों से हमेशा खुद को कम आंकना या हर समय अपनी आलोचना करना बताता है कि आप स्वयं को प्यार नहीं करते इस तरह की आलोचना करके आप अपनी कमी को ही उजागर नहीं कर रहे हैं, बल्कि अपने मनोबल को कमजोर कर रही हैं और अपनी सोच में नकारात्मकता को बढ़ावा दे रहे हैं

दिल्ली बदली अब देश बदलो लेकिन थोड़ा तरीका भी बदलो !

'आप' के लिए समय आ गया है कि केजरीवाल अब सीएम की कुर्सी मनीष सिसोदिया को सौंप कर केंद्र की राजनीति का रुख करें। देश की जनता के हित में काम करने का विचार रखने वाले मुख्यमंत्रियों के साथ मिलकर देश के विकास और उन्नति की नई परिभाषा तय करें।


बाक़ी गैर भाजपा शासित राज्य जो दिल्ली की तरह शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी लोककल्याणकारी नीतियों को लागू अपने नागरिकों के जीवन स्तर में सुधार करना चाहते हैं। इसके लिए सबसे ज़रूरी शर्त सरकारों द्वारा किये जाने वाली फिजूलखर्ची पर रोक लगाना है। उसके बादसरकारी महकमों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर काबू पानाऔर उसके बाद उन्हें सर्वप्रथम अपने राज्य की जनता को मूलभूत सुविधाएँ मुहैया कराने की ऐसी नीतियाँ बनानी चाहिए जो उनके राजस्व के अनुकूल हों और जिन्हें सही मायनों में जनता को डिलेवर किया जा सके।


क्योंकि अरविंद केजरीवाल की सरकार का राजस्व मुफ्त बिजली-पानी देकर भी सरप्लस में रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार देश के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (सीएजी) की एक रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख किया कहा गया है कि वर्ष 2013-14 से लेकर 2017-18 तक दिल्ली सरकार का राजस्व सरप्लस में रहा ह…