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Showing posts from March, 2017

मीडिया की स्वतंत्रता बनाम मर्यादा

भारतीय संविधान के अनुच्छेद19 (1) (अ) में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लेख किया गया हैं। इस अनुच्छेद को भारतीय संविधान के प्रमुख एवं प्रभावशाली अनुच्छेदों में से एक बताया गया हैं, जिसका सीधा सरोकार आम देशवासी के मूल अधिकारों की स्वतंत्रता से है। इस अनुच्छेद के द्वारा यह बताने का प्रयास किया गया है कि भारतीय लोकतंत्र में आम भारतीय नागरिक को अपनी बात को दूसरो के समक्ष रखने एवं व्यक्त करने का मूल अधिकार हैं। इस अनुच्छेद कें द्वारा दिये गए अधिेकार सही मायनों में हम भारतीयों के लिए गर्व की बात हैं, क्योंकि भारत के अलावा दुनिया में ऐसे देशों की संख्या काफी कम है जिन्होंने अपने नागरिकों को इतनी अधिक स्वतंत्रता दे रखी हों।
भारतीय मीडिया भी इसी अनुच्छेद के अंतर्गत ही अपने सभी कार्यों को अंजाम देता हैं मीडिया की आज़ादी एवं उसकी स्वतत्रंता के नाम पर जो स्वतंत्रता पत्रकार और मीडिया को है हालाँकी मीडिया की अभिव्यक्ति का दायरा और प्रभाव आम लोगों से अधिक माना जाता है। किन्तु वर्तमान युग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर भारतीय मीडिया में जमकर इस कानून का दुरूप्रयोग हो रहा हैं बात भले पित पत्रकार…

मीडिया की मंडी

नब्बे के दशक में शुरू हुई उदारीकरण की नीति से भारतीय मीडिया भी अछूता नही रहा। इसी का परिणाम है कि मात्र दो दशकों में ही भारतीय मीडिया एक सफल एंव वृहत उधोग  का रूप ले चुका है। अब ये मात्र सामाजिक सरोकार की दृष्टि एंव नीति से कार्य नही करता।  बल्कि इसका भी उद्देश्य अब व्यक्तिगत लाभ तक केंद्रित होता जा रहा है। पिछले कुछ सालो में आयी निजी टी0 वी0 चैनलों एंव एफ0 एम0 रेडियों की अप्रत्याशित बाढ़ ने इस क्षेत्र में निजी लोगों एवं संस्थानों का वर्चस्व इस हद तक बढ़ा दिया है कि अब ये लोग इसका प्रयोग अपने निजी स्वार्थ साधने के लिए भरपूर करते है। जिसमें अधिक से अधिक लाभ कमाना इनका मुख्य उद्देश्य है। अनगिनत खबरिया एंव मनोंरजन चैनलों के अलावा लोगों की रूचि प्राईवेट एफ0एम0 चैनलों में भी दिखी है, जिसके फलस्वरूप मनोरंजन का साधन माना जाने वाला मीडिया अब एक गंभीर व्यापार का रूप लें चुका है।

भारतीय मीडिया आज जिस व्यवसायिक गति से आगे बढ़ रहा है उसमें सबकुछ बिकने लगा हैं।सूर्यग्रहण से लेकर चन्द्रग्रहण तक भूकंप से लेकर बाढ, तक आतंकवाद,क्रिकेट, सिनेमा,आत्महत्या करते किसान,तनावग्रस्त स्कूली बच्चें,बेरोजगार किशोरो …

ऐसी भी क्या जल्दी थी ?

8नवम्बरकीरात को प्रधानमन्त्री मोदीद्वारा500एवं1000के नोटबंदी के साहसिकघोषणासे एकओरजहां सभी राजनीतिक दलोंएवं कालाबाजारियों के बीचमें हडकंप मचगई,वहीँदूसरी ओरउनके इस निर्णय ने भारतीय अर्थव्यवस्था में अप्रत्याशित परिवर्तन आ गया है.कई जानकारप्रधानमन्त्री केइस निर्णय के दूरगामी परिणामों को देश केभविष्य केलिए एक सकारात्मक कदम बता रहे है. लेकिन इसकी क्या गारंटी है कि ऐसा होगा ही?जिस तरह आधी-अधूरी तैयारी से इस निर्णय को अचानक लागू किया गया वो आम जनता से लेकर व्यापारीवर्ग तकके लिए खासी परेशानी का सबब बनता नज़र आ रहा है.इस प्रकार के बड़े निर्णय को लेकरसरकारकीतैयारीकितनीनाकाफी थी,इसका अंदाजा हो रहे नुकसान कोदेखकर समझा जा सकता है.जनता अपने ही पैसों को निकालने, खर्च करने के लिए सरकारी आदेश के दायरों में बंधगई है.बच्चे, बूढ़ेएवं महिलाएं सभी बैंकों,एटीएम सेंटर के बाहर कतार में खड़े इस तुगलकी फरमान को झेलने के लिए विवश है.ऐसा नहीं है कि इससे पहलेकी सरकारों नेविमुद्रीकरण की नीति नहीं अपनाई गई थी मगर तब भी उस निर्णय में शुचिता कम और राजनीति ज्यादा थी! वो तब भी असफल रही और आज भी ऐसा ही मालूम पड़ता है.

व्यापार…