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ऐसी भी क्या जल्दी थी ?



8 नवम्बर की रात को प्रधानमन्त्री मोदी द्वारा 500 एवं 1000 के नोटबंदी के साहसिक घोषणा से एक ओर जहां सभी राजनीतिक दलों एवं कालाबाजारियों के बीच में हडकंप मच गई, वहीँ दूसरी ओर उनके इस निर्णय ने भारतीय अर्थव्यवस्था में अप्रत्याशित परिवर्तन आ गया है. कई जानकार प्रधानमन्त्री के इस निर्णय के दूरगामी परिणामों को देश के भविष्य के लिए एक सकारात्मक कदम बता रहे है. लेकिन इसकी क्या गारंटी है कि ऐसा होगा ही? जिस तरह आधी-अधूरी तैयारी से इस निर्णय को अचानक लागू किया गया वो आम जनता से लेकर व्यापारी वर्ग तक के लिए खासी परेशानी का सबब बनता नज़र आ रहा है. इस प्रकार के बड़े निर्णय को लेकर सरकार की तैयारी कितनी नाकाफी थी, इसका अंदाजा हो रहे नुकसान को देखकर समझा जा सकता है. जनता अपने ही पैसों को निकालने, खर्च करने के लिए सरकारी आदेश के दायरों में बंध गई है. बच्चे, बूढ़े एवं महिलाएं सभी बैंकों, एटीएम सेंटर के बाहर कतार में खड़े इस तुगलकी फरमान को झेलने के लिए विवश है. ऐसा नहीं है कि इससे पहले की सरकारों ने विमुद्रीकरण की नीति नहीं अपनाई गई थी मगर तब भी उस निर्णय में शुचिता कम और राजनीति ज्यादा थी! वो तब भी असफल रही और आज भी ऐसा ही मालूम पड़ता है.


व्यापारियों में भी सरकार के इस निर्णय को लेकर खासा गुस्सा देखने को मिल रहा है. ऐसे कई प्रकार के व्यापार है जिनसे जुड़े व्यापारी अपने ज़्यादातर लेन-देन रोकड़ में ही करते है. किसान, सब्जी-भाजी के छोटे विक्रेता से लेकर बड़ी मंडियों तक में लाखों रुपयों कि सब्जी फल सड़ने से होने वाले नुकसान का सरकार के पास कोई उत्तर नहीं है. गाँव, देहात में जहां बैंकिंग सुविधाओं का अभाव है दिहाड़ी मजदूरी कर घर चलने वालों के लिए ये फैसला किसी आफत से कम मालूम नहीं पड़ रहा. घंटों तक एटीएम के बाहर भूखे-प्यासे खड़े लोग ये नहीं समझ पा रहे है कि सरकार के इस फैसले से उन्हें क्या लाभ होगा? और अगर भविष्य में कोई लाभ होगा भी तो उनके आज के नुकसान कि भरपाई कैसे और कहाँ से होगी, कौन इसकी जिम्मेदारी लेगा? कई ऐसे असंगठित क्षेत्र के व्यापार है जिनके नुकसान का आंकलन लगाया ही नहीं जा सकता. देश में शादियों का मौसम शुरू हो चुका है. इससे जुड़े व्यापार करने वाले लोग भी  कशमकश में है कि इससे होने वाले नुकसान की भरपाई कैसे होगी और कौन करेगा ? पहले से ही बदहाली झेल रहा है किसान को इस फैसले से होने वाले नुकसान का अंदाजा लगाना भी मुश्किल है.

सरकार का ये फैसला कितना अपरिपक्व एवं जल्दबाजी में लिया गया फैसला था  इसका पता इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले 10 दिनों में हर दिन सरकार को अपने निर्णयों में परिवर्तन लाना पड़ रहा है. कभी वितमंत्री 1000 के नोट दुबारा लाने की बात करते है तो फिर दुसरे दिन अपने निर्णय में परिवर्तन कर लेते है. पहले दावा किया गया था कि दो-तीन दिन में लोगों की दिक्कतें दूर हो जाएंगी लेकिन अब वित्तमंत्री ने फरमा दिया है कि एटीएम मशीनों को ठीक से चलने में 15-20 दिन लगेंगे। 84 फीसदी नोट नए छपने में 6 से 8 महीने लग जाएँगे. साथ ही सरकार ये समझाने में भी विफल नज़र आ रही है कि यदि 500 और 1000 के नोटों से कालाबाजारी भ्रष्ट्राचार को बढ़ावा मिलता था तो एक मुश्त 2000 का नोट से कैसे इस समस्या का समाधान होगा? वितमंत्री को ये बताना चाहिए कि जिन लाखों गांवों और हजारों कस्बों में ये मशीनें और बैंक नहीं हैं, उनके नागरिक क्या करेंगे?


बिहार और मप्र की कुछ गांवों में भूखे ग्रामीण मजदूरों ने अनाज की दुकानें लूट ली हैं। जरा अंदाजा लगाइए इस दौरान अर्थव्यवस्था होने वाले नुकसान का.

नेताओं, आतंकवादियों, तस्करों के अलावा काले धनिकों ने अपना पैसा कई धंधों में लगा रखा है। जिसके लिए सरकार के पास कोई रणनीति नहीं दिख रही विदेशों में जमा काले धन, संपत्ति एवं सोने आदि में इस क्रांति का कोई असर होता नहीं दिख रहा.जिन आम लोगों के वोटों से यह सरकार बनी है, कहीं उनका गुस्सा हद से पार न हो जाए।

प्रधानमन्त्री जनता से 50 दिन मांग कर सब कुछ ठीक कर देने का दावा कर रहे है, अच्छा होता कि वो 50 दिन पहले एक सशक्त रणनीति बना लेते. सरकार को चाहिए था कि वो इस तरह के निर्णय को लागू करने से पहले इसके त्वरित व्यापक नुकसान का आंकलन करती और आम जनता को होने वाले नुकसान के रोकथाम का उपाय निकाल कर ही निर्णय लेती.



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