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मीडिया की मंडी

नब्बे के दशक में शुरू हुई उदारीकरण की नीति से भारतीय मीडिया भी अछूता नही रहा। इसी का परिणाम है कि मात्र दो दशकों में ही भारतीय मीडिया एक सफल एंव वृहत उधोग  का रूप ले चुका है। अब ये मात्र सामाजिक सरोकार की दृष्टि एंव नीति से कार्य नही करता।  बल्कि इसका भी उद्देश्य अब व्यक्तिगत लाभ तक केंद्रित होता जा रहा है। पिछले कुछ सालो में आयी निजी टीवीचैनलों एंव एफएमरेडियों की अप्रत्याशित बाढ़ ने इस क्षेत्र में निजी लोगों एवं संस्थानों का वर्चस्व इस हद तक बढ़ा दिया है कि अब ये लोग इसका प्रयोग अपने निजी स्वार्थ साधने के लिए भरपूर करते है। जिसमें अधिक से अधिक लाभ कमाना इनका मुख्य उद्देश्य है। अनगिनत खबरिया एंव मनोंरजन चैनलों के अलावा लोगों की रूचि प्राईवेट एफ0एमचैनलों में भी दिखी हैजिसके फलस्वरूप मनोरंजन का साधन माना जाने वाला मीडिया अब एक गंभीर व्यापार का रूप लें चुका है।


भारतीय मीडिया आज जिस व्यवसायिक गति से आगे बढ़ रहा है उसमें सबकुछ बिकने लगा हैं। सूर्यग्रहण से लेकर चन्द्रग्रहण तक भूकंप से लेकर बाढतक आतंकवाद ,क्रिकेटसिनेमा ,आत्महत्या करते किसान ,तनावग्रस्त स्कूली बच्चें ,बेरोजगार किशोरो की खुदकुशी, पर्यावरण एंव ग्लोबल वार्मिग के नाम पर अपने अस्तित्व की लड़ाई लडती मैली-जहरीली होती गंगा-जमुना हर पल घुलता हिमालय एंव फूहड़ता परोसते कथित रियल्टी शो तक। कोई बताएं 24 घंटे न्यूज दिखाने के नाम पर चलने वाले इन न्यूज चैनलों से भी बडा रियल्टी शो कोई और हो सकता है क्या इस बात को ये लोग भी अच्छी तरहा जानतें है कि 24 घंटे खबर दिखाना संभव नहीं है शायद इसलिए ही बीच-बीच में राजू के हसगुल्ले एंव सास बहू की साजिश दिखानी पड़ती हैजो कहीं से भी कोई खबर नही होती है।
 बहरहाल इन्हें तो चाहिए मात्र एक प्रायोजक जो इनकी उटपटांग खबरों को भी प्रायोजित कर सकें अर्थात व्यवसायिक कंपनियां जो आम आदमी की खुशीयां-गम के बहाने अपना एंव अपने द्वारा उत्पादित सामानों का प्रचार-प्रसार कर अपना व्यवसाय विस्तार कर सकें। हांलाकि किसा भी तरह के स्वच्छ व्यापार से किसी को भी कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। क्योंकि प्रत्येक व्यापार से कई घरों के चुल्हों की आग जुड़ी होती है। मीडिया उधोग भी उन्हीं में से एक है। लेकिन अधिक मुनाफा एंव टीआरपीकी दौडएंव स्वंय को न0 1 सिद्ध करने के लिए होने वाले समझौते घोर निराशजनक है। कथित स्टिंग ऑपरेशन एंव सनसनीखेज ख़बरें फैलाने के लिए किसी भी सीमा तक जाने एंव खबरों को अपने तरीकों से तोड़-मरोड़ कर तैयार कर दर्शकों तक पहुँचाने के लिए इलेक्ट्रानिक मीडिया पहले ही अपनी लक्ष्मण रेखा लांघकर स्वंय को कटघरें में खड़ा कर चुका है।


अखबारी पत्रकारिता में भी पेड न्यूज का जहरीला धंधा भी जोरो-शोरो से जारी है। कई बड़े अखबार जहां अपनी लोकप्रियता की पूरी कीमत वसूलने में लगे है। वहीं इस खेल में छोटे एवं क्षेत्रिय अखबार भी पीछे नहीं है। साल 2009 के लोकसभा चुनाव एंव उसके बाद हुए महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में तो कई अखबारों पर अपनी विश्वसनीयता को भुनाने के लिए राजनीतिक दलों से उनकी रैलियों जुलूसों एंव भाषाण इत्यादि को कवर करने एवं उन दलों का अपने अखबारों द्वारा महिमामंडन करने के लिए पेड पॉलिटिकल पैकेज तक बेचने का आरोप है। इस बात की पुष्टी प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी की है। साथ में छोटें अखबारों का ये बयान कि हमारें पत्रकार जानते है कि उन्हें कैसे कमाना है। घोर निराश एंव पत्रकारिता जगत को शर्मिदा करने वाला है।


 मोटी होती मीडिया घरानों की बैलेंस शीट एंव पतला होता खबरों का स्तर इसी का परिणाम है। पत्रकारों एंव संपादको पर बढ़ता व्यवसायिक दबाव मीडिया में बढ़ते भ्रष्टाचार का घोतक है। वहीं टीआरपीटेलिविजन रैटिंग प्वाइंट का मापदंड अपने आप में कई सवाल खड़े करता है। मसलन एक निजी विज्ञापन सर्वे कम्पनी टैम (टेलिविजन आडियंस मैजरमेंट) द्वारा भारत के चन्द बडें शहरों में लगाए गए लगभग 8000 इलैक्ट्रोनिक मीटर पीप्लस मीटर कैसे भारत की लगभग 1 करोड 20 लाख जनता की रूचि को तय कर सकते हैक्या ये गणना अपने आप में कोई मायने रखती हैटीआरपीका मानक दिखाई जाने वाली खबरों का प्रभाव है या फिर उनकी एवज में विज्ञापनों से होने वाली कमाई जिसके लिए आज का मीडिया किसी भी स्तर तक की सौदेबाजी के लिए तैयार मालूम पड़ता हैजो उनकी कार्यशैली एंव विश्वसनियता पर कई प्रश्न खड़े कर उसके दीर्घकालीन जीवन पर प्रश्न चिह्र लगा उसे संकट में डाल सकता है।


 ऐसे अखबारों को न तो प्रेस परिषदएडिटर्स गिल्डऔर न ही बुद्धिजीवियों की चिंता है। और न ही मीडिया के लिए निर्धारित किसी कानून की। पिछले कुछ वर्षो में यह समस्या महामारी की तरहा फैली है। इसलिए कई जायज़-नाजायज़ धंधा करने वालो ने अपना अखबार या चैनल शुरू कर लिया है। जिसका मूल उद्देश्य उनके नाजायज़ धधों को सुरक्षा प्रदान करनासमाज एंव राजनीति के गलियारों में अपनी पैठ जमाना है। गौरतलब है कि ऐसे मीडिया घराने लोकतंत्र के लिए घातक सिद्ध हो सकते है।


अब आवश्यकता ऐसे मीडिया घरानों के सामाजिक बहिष्कार करने की है। जो अपनी ताकत का नाजायज़ फायदा उठाते है या फिर उठाने की कोशिश करते है। अच्छी एवं बुरी खबर को तय करने की जिम्मेदारी अब आम पाठक एंव दर्शक को लेनी होगी। जो की यह तय करे की एक सर्तक सजग एंव सक्रिय समाचार मीडिया कैसा होना चाहिए। ऐसा जिसने रूचिका गिरहोत्रा को भारत के हर घर की बेटी बना दिया या फिर ऐसा जो आये दिन आपको पाखंडी बाबा ,आत्मा, चुडैल एंव पुर्नजन्म की कहानी सुना-सुना कर अंधविश्वासी बनाने में विश्वास रखता है। क्योंकि एक शक्तिशाली एंव स्वतंत्र मीडिया ही हमारे समाज की दिशा एंव दशा निर्धारित करने में सहायक सिद्ध हो सकता है।

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