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Showing posts from May, 2017

तुम कोई प्यार भरी ग़ज़ल तो नहीं !

न तुमसे कुछ पाना चाहता हूँ यूँ ही बस आज़माना चाहता हूँ! तुम कोई प्यार भरी ग़ज़ल तो नहीं जाने क्यों गुनगुनाना चाहता हूँ!
न तुमसे कुछ पाना चाहता हूँ यूँ ही बस आज़माना चाहता हूँ! बिन तेरे कामिल नहीं ज़िन्दगी मेरी संग तेरे इसका मुकम्मल ठिकाना चाहता हूँ!

न तुमसे कुछ पाना चाहता हूँ यूँ ही बस आज़माना चाहता हूँ! भटक रही है तन्हां रूह मेरी तनहाइयाँ से रिश्ता मिटाना चाहता हूँ!
न तुमसे कुछ पाना चाहता हूँ यूँ ही बस आज़मान चाहता हूँ! होंगे हजारों तेरी खुशियों के हमसफ़र ग़मों को तेरे अपना बनाना चाहता हूँ!

न तुमसे कुछ पाना चाहता हूँ यूँ ही बस आज़मान चाहता हूँ! तुमको पाने की तमन्ना तो है

पहले खुद को पाना चाहता हूँ!

#हिंदी_ब्लोगिंग

मेरा परिचय

अपने बारे में क्या लिखू, मेरे हिसाब से ये दुनिया का सबसे मुश्किल काम है। बस इतना ही कहना चाहूँगा कि मैं एक बहुत ही साधारण किस्म का इन्सान हूँ, अगर कुछ ख़ास है मेरे बारे में कहने को तो वो है मेरा "साधारण" होना। एक बीमारी भी है "सोचने की बीमारी" मैं खुद को इससे बचा ही नहीं पाता "जो चल रहा है" “जो घट रहा है" मैं भी उसी को जीता हूँ, भोगता हूँ, जहाँ तक सब देखते है बस मैं उससे थोड़ा आगे देखने की कोशिश करता हूँ। गहराइयों में उतरने की आदत है मेरी। हालाँकि ज़्यादातर लोग इससे डरते है, बचते है, डूबने का खतरा जो होता है। लेकिन मैं अपनी कोशिश जारी रखता हूँ। बहुत सोचने और दोस्तों के कहने के बाद ये ब्लॉग शुरू किया है पता नहीं क्या और कब तक लिख पाऊंगा।  वैसे अगर नहीं लिखूंगा तो करूँगा भी क्या? बस एक कोशिश समझिये लिखने की, वो लिखने की जिसके बारे में शायद ज़्यादातर लोग न सोचते, है न सुनना चाहते है और न ही पढ़ना फिर भी कोशिश करूँगा की लिखूं शायद इसी का नाम नाफ़रमानी करना है।

                                                                आते रहिएगा मेरे ब्लॉग पर थोड़ी गुफ्तग…

ऊँची दूकान फिंके पकवान

भारतीय विज्ञापन मानक परिषद (ASCI) द्वारा पिछले महीनें जारी किए गए नए आंकड़ों नामों में देश विदेश के कई बड़ी दिग्गज कम्पनियों जैसे की एयरटेल, कोका-कोला, एप्‍पल, समेत कई कंपनियों के विज्ञापनों पर ऐतराज जतायाहै। ASCI का कहना है की इनके विज्ञापन भ्रामक है। ASCI ने ज्‍यादातर विज्ञापनों को गुमराह करने वाला बताया है जनवरी में जारी हुए 143 कंपनियों को ऐसे ऐड जारी करने के लिए ASCI फटकार भी लगाई है। ASCI की ग्राहक शिकायत परिषद (CCC) को 191 से भी ज्‍यादा शिकायतें आईं थी। अमूल, निविया, मोबिक्विक, स्‍टैंर्ड्ड चार्टर्ड बैंक,एचयूएल, परनॉड रिकॉर्ड एवं ओपरा, सहित अन्‍य कई बड़े नामों वाली कंपनियों के विरुध ग्राहकों ने ये सारी शिकायतें दर्ज करवाई थी। ASCI ने जहांहेल्‍थकेयर प्रोडक्ट से जुड़ी 102 शिकायतों को सही माना। वहीँ फूड व बेवरेजेस में 6 पर्सनल केयर से संबंधित 7 एवं शिक्षा से जुड़ी 20शिकायतों को सही माना। साथ ही 8 एडवर्टाइजमेंट को भी गुमराह करने वाला पाया। ASCI ने कोका कोल इंडिया द्वारा थम्स अप के प्रचार में एक बाइक सवार को सड़कों पर लोगों के बीच करतब करते हुए दिखाया है। ASCI के मुताबिक कंपनी का येप्रचा…

भूला नहीं हूँ मैं, याद हैं मुझे

भूला  नहीं  हूँ  मैं,  याद  हैं  मुझे शिकायत  करती  तुम्हारी  आँखें








भूला  नहीं  हूँ  मैं,  याद  है  मुझे माथे  पे  चमकता  वो  चाँद  का अक्स
भूला  नहीं  हूँ  मैं,  याद  हैं मुझे गुलाबी  गालों  संग  खेलती  काली  लटें
भूला  नहीं  हूँ  मैं, याद  है  मुझे होठों पे  चमकती  शबनम
भूला  नहीं  हूँ  मैं, याद  है  मुझे उम्र  से  लम्बी  ज़ुल्फों  की दास्ताँ
भूला  नहीं  हूँ  मैं, याद  है  मुझे शोर  मचाती  चूड़ियों  का  संगीत
भूला  नहीं  हूँ  मैं, याद  है  मुझे हथेली  पे  बना  मेहँदी  का  गुलाब
भूला  नहीं  हूँ  मैं, याद  है  मुझे पल-पल  गाती  पायल  का  गीत
भूला  नहीं  हूँ  मैं, याद  है  मुझे बातों  से  झड़ते  फूलों  की  ख़ुशबू
भूला  नहीं  हूँ  मैं, याद  है  मुझे

"अन्नदाता सुखी भव:"

तामिलनाडु से आये किस्मत के मारे ये किसान कभी अपने मृत रिश्तेदारों की हड्डियाँ, खोपड़ी लेकर प्रदर्शन करते है। कभी मुँह में जिंदा चूहा रखकर अपनी टीस निकालते है, कभी नंगे होकर आपके कार्यलय में घुसने का प्रयास करते है। झुलसा देने वाली इस गर्मी में नंगे बदन सड़कों पर दिन-भर बैठे ये आपके अन्नदाता आपसे एक बार मिलने का इंतज़ार कर रहे हैं ।


चावल सांभर भी ज़मीन पर सान कर खा रहे है मानो जीते जी नरक भोग रहे हो। मेरी तो हिम्मत भी नहीं हो रही की इस धूप में जंतर-मंतर जाकर इनसे मिल आऊ। वैसे भी मेरे मिलने से, इनका हाल पूछने से क्या हो जाएगा ? क्योंकी ये तो आपसे मिलने आये है पता है की इनके क़र्ज़ मॉफी की जिम्मेवारी आपकी नहीं बनती राज्य सरकार की है। मगर जब आप की सरकार नई नवेली उत्तर प्रदेश सरकार के क़र्ज़ मॉफी के फैसले में दखल दे सकती है तो यहाँ भी आप या आपका कोई नुमाइन्दा इनसे मिल सकता है। तामिलनाडु भी देश का हिस्सा है जैसे उत्तर प्रदेश और गुजरात है। वही गुजरात जहां कल आप प्रोटोकॉल तोड़ कर एक बच्ची से मिलने चले गए सुना है करोड़ों खर्च हुए आपके रोड शो में। खबर बना ली, फोटो खिचवा ली आपने अपने स्टारडम की बदौलत।



वै…

कहीं शर्मसार हुई पत्रकारिता तो कहीं निकले इसके आंसू

गिद्ध और मरणासन्न बच्ची की तस्वीर सालों पुरानी साल 1993 की है जब सूडान में अकाल पड़ा था। जोहान्सबर्ग दक्षिण अफ्रीका के जुनूनी फोटो जर्नलिस्ट केविन कार्टर अपने फोटोग्राफी के जूनून को आज़माने सूडान जा पहुचे थे। वहां उनके दिमाग में शायद सिर्फ दुर्लभ तस्वीरें खींचने का ही जूनून था इसलिए मरणासन्न बच्ची की तरफ बढ़ते गिद्ध को रोकने बजाए उन्होंने अपना सारा ध्यान तस्वीरें खींचने में ही लगा दिया। मगर परिणाम जब उनके सामने आया तो वो बर्दाश्त नहीं कर पाए , जब उन्होंने देखा की वो नरभक्षी परिंदा उस बच्ची के मांस नोच-नोच कर खा गया और वो अपने जूनून को पालते रहे, कुछ नहीं कर पाए। इस घटना के अपराधबोध से ग्रस्त केविन गहरे अवसाद में चले गए बाद में शायद पश्चाताप के लिए उन्होंने खुद्कुशी कर ली। इस तस्वीर को दुनिया भर में जहां फोटोग्राफी के जानकारों ने सराहा तो वही इसके मानवता को शर्मसार करते हिस्से के कारण इसकी भरपूर आलोचना भी हुई।

दूसरी घटना सीरिया के अल्लापो शहर के नजदीक की है जहां आतंकवादियों ने चिप्स देने के बहाने बच्चों को अपनी गाड़ी के पास बुलाया और फिर बम ब्लास्ट कर 126 लोंगो की जान ले ली। घटना में तक़री…

कोशिश

कोशिश कर रहा हूँ मैं तुम्हे भूलने की। जीवन शून्य को भरने की उत्पन्न हुआ है जो तुम्हारे चले जाने से।

कोशिश कर रहा हूँ मैं आगे बढ़ने की। उन स्मृतियों को मिटानें की निर्मित हुई थी जो हमारे मिलन से।
कोशिश कर रहा हूँ मैं कुछ नया तलाशने की। मुझमें बसी तुमको मुझसे अलग करने की बस गई थी जो बिन कहे मेरी हर सांस में।
कोशिश कर रहा हूँ मैं टूटे दिल को जोड़ने की। बिखर गया था जो अनगिनत टुकड़ों में तुम्हारे इनकार के बाद।


कोशिश कर रहा हूँ मैं, अकेले खुश रहने की, अपनी हर पीड़ा को छिपाने की प्रकट हो जाती जो तुम्हारें स्मरण मात्र से।

#हिंदी_ब्लोगिंग 

कब ख़त्म होगा अयोध्या का वनवास?

वैसे तो आस्था इतिहास एवं कानून की जटिलताओं में दीर्घकाल से जकड़ी अयोघ्या नगरी के लिए 30 सितंबर 2010 का दिन स्वतंत्रता दिवस के समान साबित हो सकता था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस संवेदनशील मुद्दे पर अपना फैसला सुनाकर वह रोशनी दिखाने का प्रयास किया था, जो सम्पूर्ण राष्ट्र को अतीत के अन्धेरे से बाहर निकाल सकती थी। मालूम हो कि भारत के इतिहास में अयोध्या का यह मामला पिछले500 – 600 वर्षो से धार्मिक विवादों में फंसा है एवं गत 67 वर्षो से न्यायालय में चल रहा है। देखा जाए तो यह समय अपने आप में राम के वनवास से भी काफी लम्बा है। साल 2010 से उच्चतम न्यायालय में लंबित पड़ा ये मामला एक बार फिर फ़रवरी 2016 में सुब्रमण्यम स्वामी के इस विवाद को लेकर काफी सक्रिय हो जाने के बाद  मीडिया की सुर्ख़ियों में आ गया था।
विदित है कि वर्ष 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भारतीयं जनता को अपने निर्णय के द्वारा विवादित जमीन का एक तिहाई हिस्सा निर्मोही अखाड़ा समिति को, एक तिहाई हिस्सा राम लल्ला विराजमान अर्थात भगवान राम की मूर्ति के लिए तथा एक तिहाई हिस्सा सुन्नी वक़्फ बोर्ड को देने का निर्णय किया था। न्यायालय के निर्णय…