Skip to main content

ये लाइफ कॉफ़ी की तरह है कॉफ़ी मग की तरह नहीं

कॉलेज के पुराने साथी अलुमिनाई मीट में सालों बाद मिले सारे दोस्त कैरियर में सेटल हो चुके थे कोई सरकारी अधिकारी बन गया था तो कोई किसी निजी संस्था का सी ई ओ दौलत, शोहोरत, रुतबा सबके पास था, मगर पुराने कॉलेज के दिनों वाली मस्ती-आज़ादी वो खुलापन कहीं गायब हो चुका था
सारे दोस्तों ने अपनी वर्तमान ज़िन्दगी के प्रति यही नजरिया बताया की अब उन दिनों जैसी लाइफ कहा....   
वहीँ प्रोग्राम के दौरान उनकी मुलाक़ात अपने कॉलेज के उस प्रोफ़ेसर से हुई जिनसे उनके सबसे मधुर संबंध थे प्रोफ़ेसर ने भी जब उनसे उनकी कामयाबी के बारे में पूछा तो सबने वही जवाब दिया

कुछ सोचने के बाद प्रोफ़ेसर ने उन सबको अगले दिन अपने यहाँ कॉफ़ी पीने के लिए आमंत्रित किया
अगले दिन सभी 8-10 दोस्त तय समय पर प्रोफ़ेसर के घर उसी कमरे में जुट गए जहां वो कभी टियुशन पढ़ने जाया करते थे थोड़ी देर देश-दुनिया की बातचीत करने के बाद प्रोफ़ेसर ने उन्हें कहा की वो सब बैठे तब तक वे उनके लिए कॉफ़ी बना के लाते है
कुछ देर बाद किचन के अन्दर से प्रोफ़ेसर ने आवाज़ लगाई, “स्टूडेंट्स आप सब प्लीज आकर अपने लिए कॉफ़ी ले जाए
सभी दोस्त किचन की ओर लपके, वहां खुबसूरत कॉफ़ी मग्स में उनके लिए शानदार कॉफ़ी तैयार थी साथ ही वो सारे मग्स देखने में इतने लुभावने थे कि हर एक को अपनी पसंद का मग चुनने में समय लगाना पड़ा

जब सभी स्टूडेंट्स कॉफ़ी लेकर वापस रूम में आ गए तब प्रोफ़ेसर ने उनसे कहा की मैंने देखा की आप सबने अपनी पसंद का मग चुनने में अच्छा-खासा समय दियाहालाँकि उससे कॉफ़ी के स्वाद में कोई बदलाव नहीं होने वाला मगर फिर भी आप अच्छे से अच्छा मग लेने के लिए लगे रहे और अपनी पसंद का मग लेने के बाद भी दुसरे के मग को ललचाई नजरों से निहारते रहे जबकि आपको जो सही मायने में चाहिए था वो तो कॉफ़ी थी ये मग्स तो बस कॉफ़ी पीना का एक जरिया मात्र है
सभी स्टूडेंट्स एक दूसरे का मुँह ताकने लगे, प्रोफ़ेसर ने तब कहा की “ये हमारी लाइफ भी कॉफ़ी की तरह ही है
पैसा, पोजिशन बड़ी नौकरी करोड़ों का व्यापार उस मग की तरह है जिसके लिए हम संघर्ष जीवन में करते है                  

ये सब चीज़े जिंदगी जीने के साधन है खुद ज़िन्दगी नहीं, ऐसे में हमारे पास कौन सा मग है ये हमारी ज़िन्दगी जीने के तरीके को बताता है ज़िन्दगी के असल स्वाद को नहीं  
इसलिए लाइफ में कॉफ़ी की चिंता करना ज़रूर है मग की नहीं दुनिया में वो लोग सबसे खुशहाल नहीं है जिनके पास सबकुछ है बल्कि वो लोग ज्यादा खुश है जिनके पास सबकुछ नहीं है फिर भी वो खुश है

क्योंकी वो अपने पास मौजूद सीमित साधनों का खुले दिल से इस्तेमाल करते है लाइफ को एन्जॉय करते है और खुश रहते है   

#हिंदी_ब्लोगिंग 

Comments

Popular posts from this blog

राखोश- भारत की पहली पीओवी तकनीक आधारित साइकोलॉजिकल थ्रिलर!

तकनीक के इस्तेमाल के मामले में वैसे तो भारतीय सिनेमा हॉलीवुड से अभी बहुत पीछे माना जाता है। लेकिन अब शायद वो दौर शुरू हो गया है जब भारतीय फ़िल्म निर्माता/निर्देशकों ने फ़िल्म निर्माण में कहानी और संगीत के अलावा इससे जुड़े अन्य पहलुओं पर भी गंभीरता से विचार करना शुरू कर दिया है।

शायद ये इसी का नतीजा है कि देश में पहली बार और विश्व सिनेमा के इतिहास में दूसरी बार पीओवी तकनीक का इस्तेमाल कर एक फ़िल्म का सफ़लतापूर्वक निर्माण किया गया है।



क्या है ये पीओवी तकनीक?

पीओवी का मतलब होता है (पॉइंट ऑफ़ व्यू- नज़रिया)। आपने अक्सर फ़िल्मों में किसी ख़ास किरदार के नज़रिए को लेकर फरमाए गए कुछ ख़ास सीन्स या डायलॉग देखे होंगे। लेकिन यदि एक पूरी की पूरी फ़िल्म ही किसी ख़ास क़िरदार के नज़रिए से बना दी जाए, तो क्या कहने!

दरअसल यहाँ सिर्फ़ ये बात ख़ास नहीं है कि एक किरदार विशेष को पूरी कहानी में तवज्जों दी गई है। बल्कि इस फ़िल्म की ख़ासियत ये है कि फ़िल्म का मुख्य कलाकार कोई और नहीं बल्कि फ़िल्म का कैमरा है। जो फ़िल्म के मुख्य किरदार का रोल निभाता है जिसके इर्द-गिर्द फ़िल्म की कहानी घूमती है।

दर्शक इस मुख्य किरदार को देख तो नहीं …

...इसलिए भारत ही नहीं वैश्विक अर्थव्यवस्था पर छा रहें हैं मंदी के बादल !

भारतीय अर्थव्यवस्था की चाल पिछले कुछ महीनों से स्पष्ट रूप से आने वाली मंदी के संकेत दे रही है। हालांकि अर्थव्यवस्था के जानकारों को ये दबाव एक के बाद एक किये गए नोटबंदी और जीएसटी के प्रयोग के तुरंत बाद से ही समझ आने लगा था। मगर केंद्र सरकार के अड़ियल रवैये के कारण इसका कोई ठोस हल नहीं निकल पाया। मेरे अपने शहर जमशेदपुर जहां एशिया की सबसे विशाल(Adityapur IndustrialAreaDevelopment Authority - AIADA Jharkhand India). में स्थित 1100 छोटी-बड़ी फैक्टरियां इस मंदी की शुरूआती भेंट चढ़ चुकी हैं
कारण टाटा मोटर्स का अपना उत्पाद घटाया जाना। जिनके लिए ये सभी फैक्टरियां विभिन्न प्रकार के ऑटो पार्ट्स बनाती थी। आप खुद अंदाज़ा लगा सकते हैं कि कितने लोग बेरोज़गार हुए होंगे कितने परिवारों की रोज़ी-रोटी का संकट आन खड़ा हुआ होगा। मगर दुर्भाग्य से ये संकट शायद जल्द न टल पाए क्योंकि डगमगाती भारतीय अर्थव्यवस्था के बाद अब जर्मनी और चीन जैसी बड़ी आर्थिक शक्तियों ने भी बुरे संकेत देने शुरू कर दिए हैं पूरी ख़बर नीचे पढ़ें...

जीएसटी और नोटबंदी के प्रयोग से चरमराई भारतीय अर्थव्यवस्था एवं भारतीय बाज़ार में तेज़ी से ख़राब हो रही ऑटो…

अल्लाह के नाम पर या मुल्ला के नाम पर ?

ज़ायरा वसीम जब फिल्मों में आयी थी तो ये उसकी मर्ज़ी थी। अब अगर वो फिल्मों में काम नहीं करना चाहती तो उसके फैसले का सम्मान होना चाहिए, न कि उसके फैसले पर स्टुडियो वाली अधकच्ची जानकारी के आधार पर मुर्गा लड़ाई आयोजित कर टीआरपी बढ़ाने का बेशर्म काम किया जाना चाहिए।

हालांकि अगर हम अपने आस-पास झांके तो हमें आपने आस-पास अल्लाह के ऐसें हज़ारों बंदे मिल जाएंगे जो दिनभर, 5 वक़्त की नमाज़ में अल्लाह से उनके लिए एक बार बॉलीवुड के रास्ते खोल देने की दुआ करते रहते हैं।



जबकि ज़ायरा वसीम की गलती ये  है कि वो बॉलीवुड को छोड़ने को लेकर कोई तर्कसंगत ठोस जवाब नहीं दें पायी जिससे कि उसके इस निजी फैसले पर कोई सवाल न उठे। दरअसल सही मायने में तो उसे किसी तरह का जवाब या सफाई देने की ज़रूरत थी भी नहीं।  कि, वो अपनी जिंदगी में आगे क्या करना चाहती है। लेकिन शायद ज़ायरा ने उम्र और तजुर्बे के कच्चेपन में ये एक चाही-अनचाही गलती कर दी।

उसने जिस तरह से अपने फैसले को धर्म, मज़हब से प्रभावित होकर लेने की बात कही वो बात कईयों के गले नहीं उतर रही। क्योंकि, बॉलीवुड में आजतक अगर किसी धर्म-जात या मज़हब के लोगों का राज रहा है तो उसमें प…