Skip to main content

बाबा रे बाबा

बाबा रामदेव की कंपनी पतंजलि के 6 प्रोडक्ट बक्टोक्लेव, अमला चूरन,दिव्या गषर चूरन,बकूची चूरन,त्रिफला चूरन, अश्वगंधा चूरन, अदिव्य चूरन,  नेपाल की लैब में फ़ैल हो गए है. ये वही बाबा रामदेव है जो आपसे पतंजलि के शुद्ध प्रोडक्ट्स  खाने की बात कहते है. गौरतलब है की ये  वही सारे प्रोडक्ट्स हैं जो भारत की लैब में  पास हो जाते है ? कैसे पता नहीं.



 यहाँ ये सोचने वाली बात है की क्या क्या भारत में इनका निर्माण स्तर अलग होता है या फिर नेपाल को जो की बाबा रामदेव के साथी स्वामी बाल कृष्ण की धरती है वहां ही घटिया माल भेजा जाता है. फिलहाल नेपाल की सरकार ने विज्ञापन जारी कर इन सभी प्रोडक्ट्स की बिक्री पर रोक लगा दी है. इसके लिए वहां की सरकार ने बाकायदा एक विज्ञापन भी सभी स्थानीय अख़बारों में दिया है और लोगों को इन सभी प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल न करने की चेतावनी दी है. इससे पहले भी बाबा रामदेव की कंपनी पतंजलि द्वारा बनाया जाने वाला आम्ला जूस का मामला जिसे भारतीय सेना ने लैब टेस्ट में फ़ैल होने के बाद रिजेक्ट कर दिया था काफी चर्चा में था. पतंजलि पर दूसरी कंपनियों के सामानों पर अपना लोगो लगाकर लोगों को भ्रमित करने की बात पहले प्रकाश में आ चुकी है.

बाबा रामदेव अपना व्यापार भारतीय संस्कार को बचाने की दुहाई देकर भारत माता, गोउ माता को बचाने, योगा जैसे धार्मिक देश प्रेम की संवेदनशील बातों-मसलों के जरिये करते है. ऐसे में भारतीय परंपरा को इस प्रकार बदनाम करने और भारतीय जनमानस के जज्बातों से  खेलने उनका व्यापार करने के लिए बाबा को कभी कोई दंड/जुर्माना लग पाएगा ?
#हिंदी_ब्लोगिंग 

Comments

Popular posts from this blog

राखोश- भारत की पहली पीओवी तकनीक आधारित साइकोलॉजिकल थ्रिलर!

तकनीक के इस्तेमाल के मामले में वैसे तो भारतीय सिनेमा हॉलीवुड से अभी बहुत पीछे माना जाता है। लेकिन अब शायद वो दौर शुरू हो गया है जब भारतीय फ़िल्म निर्माता/निर्देशकों ने फ़िल्म निर्माण में कहानी और संगीत के अलावा इससे जुड़े अन्य पहलुओं पर भी गंभीरता से विचार करना शुरू कर दिया है।

शायद ये इसी का नतीजा है कि देश में पहली बार और विश्व सिनेमा के इतिहास में दूसरी बार पीओवी तकनीक का इस्तेमाल कर एक फ़िल्म का सफ़लतापूर्वक निर्माण किया गया है।



क्या है ये पीओवी तकनीक?

पीओवी का मतलब होता है (पॉइंट ऑफ़ व्यू- नज़रिया)। आपने अक्सर फ़िल्मों में किसी ख़ास किरदार के नज़रिए को लेकर फरमाए गए कुछ ख़ास सीन्स या डायलॉग देखे होंगे। लेकिन यदि एक पूरी की पूरी फ़िल्म ही किसी ख़ास क़िरदार के नज़रिए से बना दी जाए, तो क्या कहने!

दरअसल यहाँ सिर्फ़ ये बात ख़ास नहीं है कि एक किरदार विशेष को पूरी कहानी में तवज्जों दी गई है। बल्कि इस फ़िल्म की ख़ासियत ये है कि फ़िल्म का मुख्य कलाकार कोई और नहीं बल्कि फ़िल्म का कैमरा है। जो फ़िल्म के मुख्य किरदार का रोल निभाता है जिसके इर्द-गिर्द फ़िल्म की कहानी घूमती है।

दर्शक इस मुख्य किरदार को देख तो नहीं …

...इसलिए भारत ही नहीं वैश्विक अर्थव्यवस्था पर छा रहें हैं मंदी के बादल !

भारतीय अर्थव्यवस्था की चाल पिछले कुछ महीनों से स्पष्ट रूप से आने वाली मंदी के संकेत दे रही है। हालांकि अर्थव्यवस्था के जानकारों को ये दबाव एक के बाद एक किये गए नोटबंदी और जीएसटी के प्रयोग के तुरंत बाद से ही समझ आने लगा था। मगर केंद्र सरकार के अड़ियल रवैये के कारण इसका कोई ठोस हल नहीं निकल पाया। मेरे अपने शहर जमशेदपुर जहां एशिया की सबसे विशाल(Adityapur IndustrialAreaDevelopment Authority - AIADA Jharkhand India). में स्थित 1100 छोटी-बड़ी फैक्टरियां इस मंदी की शुरूआती भेंट चढ़ चुकी हैं
कारण टाटा मोटर्स का अपना उत्पाद घटाया जाना। जिनके लिए ये सभी फैक्टरियां विभिन्न प्रकार के ऑटो पार्ट्स बनाती थी। आप खुद अंदाज़ा लगा सकते हैं कि कितने लोग बेरोज़गार हुए होंगे कितने परिवारों की रोज़ी-रोटी का संकट आन खड़ा हुआ होगा। मगर दुर्भाग्य से ये संकट शायद जल्द न टल पाए क्योंकि डगमगाती भारतीय अर्थव्यवस्था के बाद अब जर्मनी और चीन जैसी बड़ी आर्थिक शक्तियों ने भी बुरे संकेत देने शुरू कर दिए हैं पूरी ख़बर नीचे पढ़ें...

जीएसटी और नोटबंदी के प्रयोग से चरमराई भारतीय अर्थव्यवस्था एवं भारतीय बाज़ार में तेज़ी से ख़राब हो रही ऑटो…

अल्लाह के नाम पर या मुल्ला के नाम पर ?

ज़ायरा वसीम जब फिल्मों में आयी थी तो ये उसकी मर्ज़ी थी। अब अगर वो फिल्मों में काम नहीं करना चाहती तो उसके फैसले का सम्मान होना चाहिए, न कि उसके फैसले पर स्टुडियो वाली अधकच्ची जानकारी के आधार पर मुर्गा लड़ाई आयोजित कर टीआरपी बढ़ाने का बेशर्म काम किया जाना चाहिए।

हालांकि अगर हम अपने आस-पास झांके तो हमें आपने आस-पास अल्लाह के ऐसें हज़ारों बंदे मिल जाएंगे जो दिनभर, 5 वक़्त की नमाज़ में अल्लाह से उनके लिए एक बार बॉलीवुड के रास्ते खोल देने की दुआ करते रहते हैं।



जबकि ज़ायरा वसीम की गलती ये  है कि वो बॉलीवुड को छोड़ने को लेकर कोई तर्कसंगत ठोस जवाब नहीं दें पायी जिससे कि उसके इस निजी फैसले पर कोई सवाल न उठे। दरअसल सही मायने में तो उसे किसी तरह का जवाब या सफाई देने की ज़रूरत थी भी नहीं।  कि, वो अपनी जिंदगी में आगे क्या करना चाहती है। लेकिन शायद ज़ायरा ने उम्र और तजुर्बे के कच्चेपन में ये एक चाही-अनचाही गलती कर दी।

उसने जिस तरह से अपने फैसले को धर्म, मज़हब से प्रभावित होकर लेने की बात कही वो बात कईयों के गले नहीं उतर रही। क्योंकि, बॉलीवुड में आजतक अगर किसी धर्म-जात या मज़हब के लोगों का राज रहा है तो उसमें प…