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दंगा

किसी खुशहाल शहर के नजदीक जंगल में गिद्धों का एक परिवार रहता था। परिवार में नर-मादा गिद्ध के अलावा उनका एक छोटा सा बच्चा था। एक दिन सुबह-सुबह जब गिद्ध का जोड़ा अपने बच्चे को घोंसले में छोड़ शहर की ओर खाने की तलाश में उड़ान भरने ही वाला था कि छोटे से गिद्ध ने आकर एक फरमाइश उनके सामने रख दी।


फरमाइश ऐसी कि किसी का भी दिल दहल जाएनन्हें गिद्ध ने अपने माता-पिता से कहा की वो रोज़-रोज जानवरों का गोश्त खाकर तंग आ गया है। और उसने सुना है कि इंसानों का गोश्त बड़ा ज़ायकेदार और नमकीन होता है इसलिए उसे इंसानी गोश्त खाना है।



अपने छोटे से बच्चे की बात सुनकर माता-पिता ने उसे समझाने की कोशिश की कि ये काम आसान नहीं हैइंसान का गोश्त मिलना थोड़ा मुश्किल है। मगर बच्चे की जिद्द के आगे उनकी एक न चली। बच्चे ने गुस्से में कह दिया की अगर उसे इंसानी गोश्त खाने न मिला तो वह खाना-पीना छोड़ देगा। ऐसे में माता-पिता दोनों ने उससे वादा किया की वो पूरी कोशिश करेंगे कि आज वो अपने बेटे के लिए इंसान का मांस लेकर आएं। इतना कहने के साथ ही दोनों पंख फैलाए नजदीक के शहर की ओर उड़ गए।


नर गिद्ध ने जहां इंसानी गोश्त की तलाश में मुस्लमानों की बस्ती का रूख किया तो वहीं मादा हिन्दुओं के मोहल्ले की ओर बढ़ गई। आधे से ज्यादा दिन पार हो गया मगर कहीं भी उन्हें इंसानी मांस का कोई टुकड़ा नहीं मिला। निराश हो दोनों एक पेड़ की छाव में बैठकर सोचने लगे की शायद इंसानी मांस खोज पाना नामुमकिन है। 

इसके बाद उन्होंने ने तय किया की दोनों वापस उन्हीं मोहल्लों की ओर वापस जाएंगे और जिस भी जानवर का मांस मिलेगा उसे लेकर घोंसले में लौट जाएंगे। आज वो अपने बेटे को किसी तरह मना लेगे और जल्द ही उसके लिए इंसानी गोश्त का जुगाड़ लगाने की कोशिश करेंगे। नर को मुस्लिम बस्ती में जहां कसाई से गौमांस का टुकड़ा मिला वहीं मादा गिद्ध को हिन्दुओं के मोहल्ले से सूअर का मांस मिला।

घोसले में पहुंच कर जैसे ही दोनो ने अपनी चोंच में दबे मांस के टुकड़े बच्चे को दिए बच्चा समझ गया कि ये इंसान का गोश्त नहीं है, गुस्साए बच्चे ने उसे खाने से मना कर दिया। इस तरह तीन दिन बीत गए मांस के टुकड़े जस के तस पड़े रहे मगर बच्चे ने खाना तो दूर उसकी तरफ देखा तक नहीं।



परेशान गिद्ध ने अपना शातिर दिमाग चलाया और गौमांस का टुकड़ा चोच में दबाकर अपनी पत्नी को भी दुसरा टुकड़ा मुंह में दबाने को कहा। फिर दोनों ने शहर की ओर एक मनहूस उड़ान भरी! थोड़ी देर में गिद्ध गौमांस मुंह में दबाए मंदिर के छत पर मंडराने लगा वहीं मादा गिद्ध भी सूअर का मांस लिए मस्जिद की मीनारों के इर्द-गिर्द चक्कर काटने लगी। 

मौका पाते ही दोनों ने अपना काम कर दिया। शाम ढलते तक शहर की फिज़ा बदल चुकी थी। कहीं किसी की दुकान जल रही थी तो कहीं किसी ओर दर्ज़नों  झोपड़ियां आग के हवाले की जा चुकी थी। रह-रह कर गलियों-घरों से रोने,सिसकने की आवाजे आती। सड़कों पर जली हुई गाड़ियां और यहां-वहां क्षत-विक्षत मानव शव बिखरे पडे थे।



गिद्ध के बच्चे की तमन्ना पूरी हो गई थी अब उसके पास कई दिनों तक पेट भर खाने के लिए इंसानी गोश्त था। उधर शहर में इंसान कफ्यू हटने का इंतजार कर रहे थे ताकि अपने बच्चों के लिए कुछ खाने का जुगाड़ कर पाएं।







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