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Showing posts from July, 2017

कहीं आपके ऑफिस में भी तो नहीं घुस आया है ये सांप?

ये कहानी दुनिया के एक बड़े शहर में तेज़ी से बढ़ती एक प्राइवेट कंपनी और उसके कर्मचारियों के बीचबढ़ती आपसी दूरियों की हैकभी छोटे से कमरे से शुरू हुई इस कंपनी के मालिक ने अपने अपने कर्मचारियों के साथ मिलजुल कड़ी मेहनत और आपसी तालमेल से नई ऊचाईयों तक पहुचाया मगर ज्यो-ज्यो कंपनी आगे बढ़ती गयी आपसी तालमेल कहीं पिछड़ता चला गया अब भी मेहनत तो सब करते मगर पेशेवर तरीके से, किसी में भी अपने काम के प्रति पहले सा लगाव नहीं रहा किसी को किसी से कोई मतलब नहीं मालिक का ध्यान सिर्फ और सिर्फ मुनाफा कमाने में रह गया था उसके साथ कंपनी के शुरूआती दिनों में जुड़े कई पुराने लोग अब सिर्फ कर्मचारी बन रह गए थे। जबकि कभी वे और कंपनी के मालिक काफी करीब थे।  

ज़्यादातर कर्मचारियों को छोड़कर सभी ऊँचे पद पर बैठे कर्मचारियों, मालिक के लिए अगल से शानदार कैबिन तैयार हो गए थे अक्सर अपने कर्मचारियों के साथ बैठने वाले मालिक के कैबिन में अब बिना अपपोइंमेट लिए किसी का भी जाना मना हो गया था मालिक एवं ऊँचे पद पर बैठे कर्मचारियों लिए अब एक प्राइवेट बाथरूम भी बन गया था जहां भी बाकि कर्मचारियों के जाने पर पाबन्दी थी धीरे-धीरे ऑफिस…

ऐसे करें खाद्य पदार्थ संबंधी कंपनियों की शिकायत

बात नामी-गिरामी रेस्टोरेंट की करें या फिर पैकेट बंद खाने के विभिन्न आइटम्स बेचने वाली देसी-विदेशी कंपनियों की! भारत में ऐसी ख़बरें अक्सर ही देखने-पढ़ने को मिल जाती है कि अमुक कम्पनी के खाद्य पदार्थ में मरा हुआ कॉक्रोच, कीड़े वगेरा मिलेमगर जानकारी के अभाव में एवं पश्चिमी देशों की तुलना में हमारें देश भारत में उपभोगता संरक्षण के कमज़ोर नियमों के कारण आम उपभोगता ऐसे मामलों में कुछ खास कार्यवाही कर ही नहीं पाता। हालाँकि ऐसा नहीं है कि भारत में उपभोगता के अधिकार को लेकर कोई उपयुक्त नियम नहीं है. मगर जानकारी और जागरूकता के अभाव में अक्सर ऐसे मामले घर के अन्दर ही रफा-दफा हो जाने है। 
जबकि पश्चिमी देशों में तो ऐसी घटनाओं से वहां की जनता एवं उपभोगता संरक्षण, उपभोगता अधिकारों के जानकार बड़ी कड़ाई के साथ निपटते हैवहीँ भारत में ज़्यादातर उपभोगता बहुत हुआ तो कंपनी के द्वारा फ़ूड पैक पर दी गयी ईमेल आई डी पर या तो ईमेल कर अपना गुस्सा निकल लेते है या फिर दौबारा उस कंपनी के सामान खरीदने से तौबा करके। 
आइये आपको बताते है भारत में ऐसे मामलों को लेकर आप कहां शिकायत कर सकते जहां से आपको सही मायनो में न्याय मिल सक…

यो छोरियां के छोरों से कम सै?

!! गर देखना है मेरी उड़ान को तो जरा और ऊँचा करलो आसमान को !!
भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान मिताली राज ने एक दिवसीय क्रिकेट मैच की दुनिया में पुराने सभी रिकार्ड्स को ध्वस्त कर एक नया कीर्तिमान स्थापित कर दिया। मगर जिस देश में क्रिकेट को धर्म माना जाता है वहां क्रिकेट के पुजारी, पंडे, भक्तों में मुझे वैसा उत्साह, वैसी ख़ुशी खोजे नहीं मिल रही जैसी हमारे पुरुष क्रिकेट के खिलाड़ी देवताओं के प्रति देखने को मिलती है।
क्या कारण हो सकता है इस भेद-भाव का, ऐसी अनदेखी, सुस्ती का? शायद महिला क्रिकेट से होने वाली कमाई इसका स्टारडम ही एक मुख्य वजह है कि ज़्यादातर क्रिकेट प्रेमी जो किसी भी मैच के लिए ऑफिस-कॉलेज नागा कर लेते है, अपने व्यापार की हानि बर्दाश्त कर लेते है, ब्लैक में भी टिकट्स खरीद लेते है और रात-रात भर स्टेडियम के बाहर लाइन में एक अदद टिकट के लिए पागलों की तरह खड़े रहते है उन्हें महिला क्रिकेट में या यू कहें कि भारतीय पुरुष क्रिकेट टीम को छोड़कर किसी भी अन्य खेल में वो चमक नहीं दिखती जिसके वो दीवाने है। फिर बात भले महिला क्रिकेट की हो या फिर कब्बड्डी और हॉकी की हर जगह वस्तुस्थिति कमोवेश एक …

बारिश ही तो है !!!!

बारिश ही तो है, भागिए मत, कोई छत मत खोजिए, साथ लाए छाते को बंद भी कर दिया कीजिए कभी–कभी। किस बात का डर है? भीग ही न जाएँगे, तो क्या हुआ नमक थोड़ी है जो गल जाएँगे, पिघल जाएँगे। और फिर जब इस बरसात के बाद सूरज सो कर उठेगा तो सूखा ही देगा आपके कपड़े। तेज़ाब नहीं बरस रहा है मज़ा लीजिए मौसम का ..............

आपकी 999 वाली ब्रांडेड टी शर्ट भी सूख जाएगी और बरसात में उसका ब्रांड भी धूलकर कही छिप नहीं जाएगा। बस अपने स्मार्ट फोने को जरा संभाल के पोलीथिन में रख लीजिए, आज-कल सारे रिश्ते इस में ही तो क़ैद है।


उधर देखिए दूर तक सड़क साफ़ है कोई नहीं आएगा.....इत्मीनान से खड़े हो जाइये बीच सड़क में... वो देखिए पोल लाइट की सुनहरी रौशनी में नाचती बरसात की बूंदों को...........कितनी खुश है आपसे मिलकर, आपके स्पर्श को पाकर, आप नहीं है उनसे मिलकर? 

अरे थोडा धीमा चलिए, जल्दी-जल्दी चलने से क्या बदल जाएगा, ह्म्म्म....!!! ये मौसम बदलाव का मौसम है। हमारे मन का, हमारी कल्पनाओं का, दिमाग से दिल कीतरफ बढ़ने का, थोड़ी भूली सी शरारत एक बार फिर से करने का।