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आपका भी कोई बाबा है क्या ?

15 सालों की लम्बी लड़ाई के बाद आज आखिर दोनों ही गुमनाम महिलाओं को न्याय मिल ही गया। बलात्कार के दोषी तथाकथित धर्मगुरू रामरहीम को न्यायलय ने सश्रम 10+10 कुल 20 सालों की सजा सुनाकर एक बार फिर आम भारतीय के भरोसे को जीत लिया है आप इसमें से 10  राम का नाम बदनाम करने और 10  रहीम का नाम खराब करने की सजा भी मान सकते हैं। हालांकी भारतीय कानून के अनुसार रामरहीम के पास उच्च न्यायलय में अपील करने का विकल्प अभी उपलब्ध है। रैप से लेकर पॉप सांग गाने वाला ये बाबा कितना रंगीन मिजाज था ये बताने की जरूरत अब शायद नहीं बची है। मगर यहां सोचने वाली बात ये है कि कैसे ये बाबा लोग इतने मजबूत हो जाते है कि देखते ही देखते ये देश की कानून व्यवस्था के लिए संकट एवं मौजूदा राजनीति के लिए सिरदर्द बन जाते है। कौन पालता है इन्हें या फिर किसके फलने-फूलने में सहायक होते है ये लोग? क्या इसके पीछे सिर्फ राजनेताओं एवं राजनीतिक दलों का निहीत स्वार्थ छिपा होता है या फिर उससे कहीं ज्यादा आम लोगों की वो भौतिक एवं आत्मिक आकंक्षाए जिनके बारे में उन्हें लगता है कि वो सब ऐसे बाबाओं के द्वारा ही पूरी की जा सकती है। जिसमें खुशहाल वैभवशाली समृद्ध जीवन से लेकर मृत्यु के बाद स्वर्ग तक की बुकिंग एक गुरूदीक्षा के बाद निश्चित मान ली जाती है।

हममें से ज्यादातर के कोई न कोई फैमिली गुरू है ठीक वैसे ही जैसे बड़े लोगों के फैमिली डाक्टर या वकील होते है। पंचकूला की सड़कों पर नौजवानों की बढ़ती भीड़ की तस्वीरें देखी तो अचानक से जहन में ये सवाल कौंधा की क्यों आजके ये पढ़े-लिखे नौजवान ये सब समझ नहीं पा रहे है कि ये सब छलावा होता है? कौन है जिसने इनको ऐसी विचाराधारा का ये अफीम चटाया कि ये एक बलात्कार के आरोपी को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है? क्यों ये बाबा के विरूद्ध एक भी शब्द सुनने को तैयार नहीं है? फिर जब ऐसे बाबाओं के कुछ युवा अनुयाइयों से बात हुर्ह तो समझ आया कि इस सब का दोषी कोई और नहीं बल्कि इनके अपने परिवार वाले ही होते है।

दरअसल सामान्य भारतीय घरों में उत्तर से लेकर दक्षिण दिशा तक और पूरब से लेकर पश्चिम दिशा तक भगवान के अलावा किसी न किसी गुरू या बाबा को मानने की परंपरा एक आम सी बात है। बच्चे के जन्म से लेकर उसके जीवन के सुख-दुख में ऐसे बाबाओं का आर्शीवाद माता-पिता एवं भगवान से अधिक मायने रखता है। ज़्यादातर भक्तों की  पढाई, नौकरी, संतानोत्पत्ति संबंधी परेशानियों एवं विवाह आदि जैसे महत्वपूर्ण कार्य इन बाबाओं के ही दिशा निर्दश पर ही होते है। ऐसे लोग अपने घर की नई बहुओं एवं छोटे बच्चों को शादी एवं जन्म के तुरंत बाद ही अपने फैमिली बाबा की चाही-अनचाही दीक्षा की शर्तो में बांध देते है और वो महिलाएं भी उन बाबाओं को नए घर की परंपरा मानकर स्वीकार कर लेती है। वहीं ज्यादातर लडकियां तो अपने मायके में भी ऐसे ही किसी बाबा की अनुयायी रह चुकी होती है।
मैटीमोनियल साइट आदि में तो अब ऐसे विज्ञापन आमतौर पर देखने को मिल जाते है जहां किसी बाबा विशेष के अनुयायी की अपनी संतान के व्याह के लिए उसी बाबा के शिष्यों की मांग की शर्त सर्वोपरि होती है। यानि घुमाफिरा कर एक ही बाबा या धार्मिक संस्थान की विचारधारा का पोषण करना।

वहीं बात अगर ऐसे बाबाओं के राजनीतिक सांठ-गांठ की करे तो यहां हमेशा से तू मेरी पीठ खुजा मैं तेरी पीठ खुजाऊवाला मुहावरा चरितार्थ होता है। हर बाबा किसी न किसी क्षेत्रिय, राष्टीय राजनीतिक दल का करीबी होता है और लगभग सभी राजनीतिक दलों के बड़े-छोटे नेता इनके संस्थानों के अनुयायी या संरक्षक होते है। ऐसे में इन सबके पीछे बाबाओं का स्वार्थ धर्म की आढ़ में अपने सहीं गलत व्यापार को आगे बढाना होता है वहीं राजनीतिक दलों के लिए ये बाबा थोक में वोट दिलवाने वाला दलाल एवं ब्लैक मनी को उजला करने वाला भरोसेमंद ऐजेंट होता है। शायद यही कारण है कि देश में ज्यादातर बाबाओं पर जहां रेप, मर्डर, हवाला से लेकर सरकारी जमीनें हड़पने तक के मामाले दर्ज है तो वहीं राजनीतिक दलों पर इन्हें वोट बैंक ऐजेंट के रूप में इस्तेमाल कर संरक्षण देने के स्पष्ट-अस्पष्ट आरोप है। सभी बाबा जहां गरीब, अशिक्षित एवं बेरोजगार समाज का झुकाव अपनी कर उन्हें थोड़ी बहुत सुविधा देकर पहले अपने भक्त फिर वोट बैंक में बदलने की कला में माहिर होते है। वहीं देश के अमीर व्यापारी घरानों के लिए ऐसे बाबा काले धन को सफेद करने के लिए सबसे उत्तम जरिया। जहां ये घराने 25 लाख दान देकर 10 करोड़ की रसीद आसानी से ले लेते है इससे झटके में इन थैलीशाहों का काला धन उजला हो जाता है साथ ही समाज में मान-सम्मान अलग से बढ़ जाता है। बाकि यदि कोई दिक्कत आए तो सियासत में इनकी इतनी पकड़ होती है कि इनके गुनाहों का हिसाब-किताब करने में बरसों लग जाते है। क्योंकि बरसों से इनके भक्त बने लोग किसी भी तर्क से, प्रश्न से इन्हें परे मानते है साथ ही अपने बाबाओं के लिए ये एक बड़ी ताकत का काम तो करते है जो समय पड़ने पर मानवशीला बनाकर इनकी रक्षा के लिए तैयार रहते है। और इस सबके पीछे होता है इनका और बाबा का वो सामाजिक जीवन जिसमें इनकी कई पीढ़ियां इन बाबाओं की अंधभक्त होती है। 

ऐसा सामाजिक जीवन जिसमें तक़रीबन सभी अनुयाई एवं उनके बच्चों की स्कूल- कॉलेज की शिक्षा इन बाबाओं के आश्रमनुमा विद्यालयों में पूरी हुई होती है। जहां इन्हें ऐसी मानसिकता के साथ तैयार किया जाता है कि इनके लिए जीवन के सभी सवालों का जवाब इन बाबाओं की दी हुई शिक्षा के इर्दगिर्द ही चक्कर लगाता है। भारत में ऐसे बहुत ही कम बाबा या धार्मिक संस्थाए बची होंगी जिनके अपने स्कूल कॉलेज न हो। वैसे तो ये सभी शिक्षण संस्थान देश की साक्षरता के लिए कार्य करते दिखते है। मगर इनमें से अधिकांश के सिलेबस का एक महत्वपूर्ण एवं बड़ा हिस्सा आम शिक्षा व्यवस्था से परे अपने ऐजेंडा के प्रचार-प्रसार का होता है। फिर वो चाहे विदेशी ईसाई मिशनरियों द्वारा चलाए जा रहे शिक्षण संस्थान हो या फिर किसी भारतीय बाबा द्वारा स्थापित स्कूल कॉलेज। ऐसी धार्मिक संस्थाए गरीबों को छोटी-मोटी स्वास्थ्य संबंधी सेवाएँ  निःशुल्क या रियायती दरों पर देने का काम भी बड़ी तत्परता से करती है ताकि उनका अपने धर्मगुरूओं एवं डेरों आदि पर भरोसा बना रहें।

ब्रॉडकास्ट मिडिया का भी इन बाबाओं ने जमकर फायदा लिया है। हर सुबह-शाम झूठ एवं भ्रष्टाचार का पर्दाफाश करने के नाम चलाने वाले लगभग सभी न्यूज चैनलों पर इन बाबाओं के पेड प्रवचन प्रसारित किए जाते है।ऐसे में बस एक न्यायपालिका ही ऐसा विकल्प बन कर उभर पाया है जिसने संविधान के अनुसार सभी के लिए कानून बराबर होता है वाली बात का उल्लेख अपने इस फैसल के द्वारा किया है। वहीं जो आरोपी बाबा अभी बाहर मौज कर रहे है या इस प्रकार के कृतों में लिप्त है तथा जिन्हें लगता है की राजनीति के गलियारों में उनकी अच्छी पैठ है इसलिए उनका कभी कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता उन्हें हवालात में सज़ा काट रहे बाबाओं की दशा देख तुरंत चैत जाना चाहिए। उन्हें समझना होगा की वो चाहे अपने भक्तों की कितनी भी बड़ी फौज खड़ी कर ले, विशाल साम्राज्य बनाकर एक समानांनतर सरकार चला ले। मगर उनका भविष्य काल कोठरी में ही है। 

हमारे राजनीतिक दलों के लिए भी ऐसे बाब हमेशा  खतरे की घंटी ही साबित होते है याद कीजिये इंदिरागाँधी एवं भींडरावाला के शुरूआती रिश्तों को जिसका अंत कई जिंदगियां लील ली थी। जरूरी है कि मीडिया भी ऐसे बाबाओं से जुड़ी खबरों पर बिना किसी दबाव के सख्त रिर्पोटिग करे। जहां तक रही बात न्यायापालिका के हस्तक्षेप की तो यदि देश का आम आदमी जागरूक रहेगा, निडर रहेगा ठीक उन महिलाओं की तरह जिन्होंने आसाराम, रामपाल और अब रामरहीम को अपनी ईमानदारी एवं साहस के बल पर जेल भिजवाया तो आज नही तो कल उन्हें न्याय जरूर मिलेगा।


  

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