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ये था असली टाइगर

आज सलमान खान की बहुचर्चित फिल्म एक था टाइगर का सीक्वेंस रिलीज़ हो रही है। मगर कम ही लोग जानते होंगे कि परदे पर टाइगर के नाम की शौहरत पा रहे सलमान खान की इस ख़ुफ़िया जासूस टाइगर वाली कहानी सिर्फ एक काल्पनिक कहानी नहीं है। बल्कि ये कहानी भारत के असली ख़ुफ़िया जासूस ब्लैक टाइगर के जीवन की असली कहानी है। जी हाँ,  ब्लैक टाइगर भारत का वो जाबाज़ खुफिया जासूस जिसे भारत के तात्कालीन गृहमंत्री एस बी चव्हाण ने उसकी बहादुरी भरे कारनामों के लिए ब्लैक टाइगर के खिताब से नवाज़ा था।

आइये जाने उस असली हीरो असली टाइगर की कहानी जिसने इस देश के लिए अपनी जान दे दी। मगर अंतिम वक़्त में देश की मौजूदा सरकार ने उसे अपना जासूस मानने से इंकार कर दिया था।

रविंद्र कौशिक, यहीं नाम था हिन्दुस्तान की धरती पर पैदा हुए एक था टाइगर के असली टाइगर का। इनका जन्म 11 अप्रैल 1952 को राजस्थान के श्रीगंगानगर में हुआ था। रवींद्र कौशिक के पिता भारतीय वायुसेना में अधिकारी थे साल 1971 में सेवानिर्वित होने के बाद वे अपने परिवार के साथ दिल्ली में आकर बस गए थे रविंद्र कौशिक एक बेहतरीन थिएटर कलाकार थे, उनके इसी हुनर ने उन्हें कलाकार से भारत सरकार की ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ 'रिसर्च एंड ऐनलाईसीस विंग' का एक जासूस बनाया। रविंद्र उस वक़्त कुछ 20-21 साल के थे जब लखनऊ में आयोजित उनके एक थियेटर शो में उनके बहरूपियापन के जबरदस्त किरदार ने वहां मौजूद रॉ के कुछ वरिष्ठ अधिकारीयों को काफी प्रभावित किया।

रॉ के वो अधिकारी रविंद्र की कलाकारी से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने जल्द से जल्द उसे अपने साथ काम करने के लिए जोड़ना चाहते थे। रविंद्र की काबिलियत को देखते हुए अधिकारीयों ने उसके सामने पकिस्तान और चीन में भारत का जासूस बनकर वहां की ख़ुफ़िया जानकारी भेजने का बेहद खतरनाक काम दिया। रविंद्र इस काम के लिए तैयार हो गए।
  
              
रविंद्र को रॉ में भर्ती करने के बाद लगभग २ साल तक उन्हें दिल्ली में जासूसी से जुड़ा गहन प्रशिक्षण दिया गया। उन्हें पकिस्तान से जुड़ी हर छोटी-बड़ी बात बताई गयी, इस्लाम की पूरी शिक्षा भी दी गई। उत्तर भारत के होने की वजह से उन्हें अच्छी पंजाबी का ज्ञान तो था ही प्रशिक्षण के दौरान उनकी उर्दू भी दुरुस्त की गई ताकि उन्हें उनके मिशन में किसी तरह की कोई परेशानी न हो।

इसके बाद लगभग 23 साल की उम्र में रविंद्र को भारत का ख़ुफ़िया एजेंट बनाकर पाकिस्तान में दाखिल करवा दिया गया। ये साल 1975 था जब रविंद्र ने पाकिस्तान में अपनी नयी ज़िन्दगी एक नए नाम- नबी अहमद शाकिर, मजहब इस्लाम के साथ शुरू की। इसके बाद जल्द ही रविंद्र पकिस्तान में कराची यूनिवर्सिटी में एल एल बी की पढ़ाई में दाखिला लेने में कामयाब हुए। वहां उन्होंने अपने मिशन के साथ-साथ लॉ की पढ़ाई भी पूरी की। रविंद्र बाद में पाकिस्तानी सेना का हिस्सा भी बन गए। यहां उन्होंने सेना के एकॉउंटस विभाग में क्लर्क की पोस्ट पर ज्वाइन  किया। बाद में वहां उन्होंने सेना के टेलरिंग विभाग के एक मुलाज़िम की बेटी अमानत से निकाह भी कर लिया था। पाकिस्तानी सेना में प्रमोशन मिलने के बाद वो पाकिस्तानी सेना के मेजर पद तक जा पहुंचे। इस दौरान वो एक बेटे  अरीब अहमद खान के बाप बने जिसकी साल 2013 में मौत हो गयी है।   
सन 1979 से 1989 तक पाकिस्तानी सेना का अहम् हिस्सा रहते हुए रविंद्र कौशिक ने पाकिस्तानी सेना एवं सरकार की कई अहम् जानकारियों को अपनी मौत से खेलते हुए भारत सरकार को भेजी। ये जानकारियां भारतीय सेना एवं ख़ुफ़िया विभाग के लिए काफी अहम् साबित हुई। रवींद्र कौशिक के इस काम को देखकर भारत के गृह मंत्री एस बी चव्हाण ने उसे ब्लैक टाइगर के ख़िताब से नवाज़ा। वहीँ कई जानकारों का मानना है कि कौशिक को ये उपाधि भूतपूर्व प्रधानमन्त्री इंदरा गाँधी ने दी थी।

इसमें कोई शक नहीं है कि रविंद्र कौशिक द्वारा भेजी गयी अहम् जानकारियों का इस्तेमाल करके भारत सरकार हमेशा पाकिस्तान के मंसूबों को नाकाम करने में सफल रही। पाकिस्तान ने जब भी भारत के खिलाफ कोई साज़िश करने की कोशिश की रविंद्र कौशिक की समझदारी से वे सभी साज़िशें नाकाम रही।

मगर कहते है न कि जासूसी का काम बेहद नाजुक होता है इसमें आप कभी-कभी बिना अपनी गलती के भी भी फंस सकते है। रविंद्र कौशिक के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ वो साल 1983 की बात था जब भारत सरकार ने भारत के एक और ख़ुफ़िया एजेंट इनायत मसीह को भी पकिस्तान भेजा, जहां उसे रविंद्र कौशिक उर्फ़ नबी अहमद शाकिर से संपर्क साधना था।
मगर भारत का ये ख़ुफ़िया एजेंट इनायत मसीह इस काम में नाकामयाब रहा और पाकिस्तानी सेना के हत्थे चढ़ गया। काफी टॉर्चर के बाद उसने रविंद्र कौशिक के बारे में खुलासा कर दिया। उसके बाद जल्द ही कौशिक को पाकिस्तानी सेना ने अपनी गिरफ्त में ले लिए और 2  सालों तक काफी टॉर्चर किया। उससे कई तरह की पूछताछ की गई। उनके खिलाफ पाकिस्तानी की अदालत केस चलाया गया जहां उन्हें मौत की सज़ा सुनाई गई।

मगर फिर बाद में उनकी सज़ा को बदलकर आजीवन कारावास में परिवर्तित कर दिया गया। उमकैद की सज़ा के दौरान कौशिक को पकिस्तान की सियालकोट, कोट लखपत एवं मियांवाली जेल में रखा गया। भारत सरकार की नज़रअंदाज़ी और पाकिस्तान के रोज़ाना के जुल्मों से जल्द ही रविंद्र की हालत ख़राब होने लगी। रविंद्र दमा एवं टीवी के शिकार हो गए। अब छिपते-छिपाते बड़ी मुश्किल से वे भारत में अपने घर श्रीगंगानगर में खत भेज पाते जिसमें वे पाकिस्तान कि जेलों में उन पर हो रहे जुल्मों के बारे में लिखते।

अपने एक इंटरव्यू में रविंद्र के पिता ने बताया था कि रविंद्र ने उन्हें पाकिस्तान से लिखे खतों में उस पर ढाई जा रही यातनाओं के बारे में भी लिखा था। वे दिल दहला देने वाली यातनाएं थी, उनकी माँ अमलादेवी रविंद्र के पत्रों को पढ़कर बहुत रोती थी। उन्होंने रविंद्र की रिहाई को  लेकर कई बार मंत्रालय को खत लिखे मगर कभी किसी ने ध्यान नहीं दिया।
उनके परिवार ने इस बारे में भारत सरकार और उनके विभाग से सम्पर्क साधा मगर सरकार ने इसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। न ही रविंद्र को खोजने का कोई प्रयास किया।

रविंद्र ने अपने खत में सरकार से पूछा था कि क्या अपने देश के लिए क़ुरबानी देने का यहीं ईनाम होता है?” 

साल 2001 के नवम्बर के महीने में दिल और फेफड़ों की बीमारी से जूझ रहे रविंद्र ने मुल्तान सेंट्रल जेल में दम तोड़ दिया। बाद में पाकिस्तानी सरकार द्वारा उसे वहीँ दफना दिया गया।

रविंद्र कौशिक के भाई आर ऍन कौशिक का कहना है कि उन्हें सरकार से कोई आर्थिक मदद नहीं चाहिए। वे बस इतना चाहते है कि भारत सरकार रविंद्र को, उनके काम को पहचान दें। उसे अपना जाबाज़ सिपाही बताए मगर आज तक ऐसा नहीं हो पाया है।

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