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Showing posts from 2018

आख़िर क्या है "नेशनल हेराल्ड" केस, आसान शब्दों में जानिए ?

देश के प्रथम प्रधानमंत्री स्वर्गीय जवाहरलाल नेहरू ने 1930 में#नेशनल हेराल्ड नामक अखबार शुरू किया। धीरे-धीरे इस अखबार ने 5000/- करोड़ की संपत्ति अर्जित कर ली। सन् 2000 में यह अखबार अचानक घाटे में चला गया और इस पर 90 करोड़ का कर्जा भी हो गया।“नेशनल हेराल्ड" (National Herald) की तत्कालीन डायरेक्टर्स, सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी, सैम पित्रोदा और मोतीलाल वोरा ने, इस अखबार को यंग इंडिया (Young India Ltd) लिमिटेड नामक कंपनी को बेचने का निर्णय लिया।

किसकी कंपनी है यंग इंडिया ? पांच लाख रुपये से शुरू हुई यंग इंडिया कंपनी के बारे में मज़े की बात ये है किइसमें सोनिया और राहुल गाँधी की 38-38 प्रतिशत हिस्सेदारी है। शेष हिस्सेदारी कांग्रेस नेतामोतीलाल वोरा औरऑस्कर फर्नांडिस के पास है।
डील यह तय हुए थी कि यंग इंडिया, नेशनल हेराल्ड के 90 करोड़ के कर्ज़ को चुकाएगी और बदले में 5000 करोड़ रुपए की अचल संपत्ति यंग इंडिया को मिलेगी।इस डील को फाइनल करने के लिए मोती लाल वोरा ने "तत्काल" मोतीलाल वोरा से बात की, क्योंकि वह अकेले ही, दोनों ही कंपनियों के डायरेक्टर्स थे।
अब यहाँ एक और नया मोड़ आया। वो ये कि 90…

ज़िक्र 84 दा, साड्डे दिल चे वस्सी उदासी दा

सन 1984 के सिख विरोधी दंगों में बहुत से सिख परिवारों को बर्बाद कर दिया था। दिल्ली और उत्तर भारत के बाकी इलाकों से आए दिन सिखों की निर्मम हत्याओं की ख़बरें अख़बारों में भी छपती रही। मगर देश की राजधानी से कोसों  दूर मेरे शहर जमशेदपुर के सिख समुदाय ने कैसे अपना ये वक़्त गुज़ारा इसके किस्से मुझे मेरे घर के बड़ों ने सुनाए थे। दो दिनों पहले जब सिख दंगों के एक मुख्य आरोपी सज्जन कुमार को दिल्ली हाईकोर्ट ने इस घटना का दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सज़ा सुनाई तो पुराने ज़ख्म हरे हों गए। 



मेरे जैसे कानून को जानने-समझने वाले इस सज़ा को सुनकर भी इसलिए नहीं खुश हैं क्योंकि अभी भी देश के  सबसे बड़े कोर्ट की इस मामले से जुड़ी सुनवाई बाकी है। पता नहीं वहाँ से कब और क्या फैसला आएगा और उन दंगों में अपना सबकुछ गवां चुके कितने लोग उसे सुन पाएंगे। क्योंकि 39 साल की उम्र में जिस सज्जन कुमार ने ये कांड किया था उसे तो उसके कुकर्मों  की सज़ा 73 साल में मिल रही है जब वो ऐसे भी मरने ही वाला है।       

बात सन 1984 के सिख दंगों की! मेरे शहर जमशेदपुर में भी मौजूद सिख/पंजाबी समुदाय देश के बाकी शहरों/राज्यों के सिखों की तरह दहशत…

इसलिए नज़र बनाए रखें !

उर्जित पटेल ने अपना इस्तीफा भले ही निजी कारणों का हवाला देकर दिया हो। मगर देश के अंदर क्या चल रहा है ये किसी से छिपा हुआ नहीं है। वैसे भी आँकड़े उठाकर देख लीजिए ज़्यादातर विवादों के बाद इस्तीफा देने वाले नौकरशाह अपने इस्तीफ़े का काऱण निजी वजह ही बताते हैं।


बहरहाल पिछले दिनों  जब सरकार और आरबीआई गवर्नर (RBI Governor) के बीच टकराव की खबरें आई थी तो, उसकी मुख्य वजह सरकार द्वारा आरबीआई से 3.6 लाख करोड़ रुपये मांगे की थी। हालाँकि उस खबर के सार्वजनिक होने के बाद सरकार ने उसे झूठी ख़बर बताकर खारिज़ कर दिया था।


मगर अब जबकि अस्पष्ठ रूप से आरबीआई की कमान केंद्र सरकार के हाथों में होगी। तो, ये देखने वाली बात होगी कि सरकार अपने किस चहेते को अपना नया मुंशी नियुक्त करती है। साथ ही इस कार्य को करने में कितना वक़्त लगती है।


क्योंकि, यदि लंबे वक्त तक आरबीआई की कमान केंद्र सरकार या वित्त मंत्रालय (Finance Ministry) के हाथों में रहेगी तो वह आरबीआई के कोष में जमा देश के धन को अपने लिए खर्च कर सकती है। इस अंदेशे से इंकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में ज़रूरी है कि मीडिया, आर्थिक मामलों के जानकार, विपक्ष एवं आम आदमी …

क्या हम ऐसा कुछ नहीं सोच सकते हैं ?

छोटा सा यूरोपियन देश लक्समबर्ग अपने शहरों को पर्यावरण के अनुकूल बनाने के लिए सार्वजनिक यातायात सेवा को नि:शुल्क (Free Public Transports) करने वाला पहला देश बनाने जा रहा है। लक्समबर्ग में साल 2019 से सार्वजनिक परिवहनों की नि:शुल्क सेवा शुरू कर दी जाएगी।
विभिन्न मीडिया में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक, डेमोक्रेटिक पार्टी के जेवियर बेटेल के नेतृत्व में नई गठबंधन सरकार ने यह निर्णय अपने ग्रैंड डची केकार्यालय में लिया है। सरकार ने अगले साल गर्मियों में ट्रेनों, ट्राम और बसों पर टिकट और किराए को समाप्त करने का वादा किया है।

हालाँकि अभी भी वहाँ दो घंटे तक की यात्रा के लिए अधिक से अधिक € 2 काही खर्च आता है। यानी कि देश में सार्वजनिक परिवहन (Fares for Public Transport) का किराए अभी भी उचित हैं। वहीं छोटे से देश में गाड़ियों की भीड़ को कम करने में और भी सहायता मिलेगी। साथ ही, ऐसी खबर भी हैं कि सरकार सार्वजनिक परिवहन (रेलयात्रा) के प्रथम श्रेणी के किराए को (€ 4) से घटाकर (€ 3) और पूरे दिन द्वितीय श्रेणी के टिकट की दर को भी कम कर सकती है।


आपको बता दें कि वहाँ का एक आम युवा अपने वार्षिक "एमपास"…

आखरी उम्मीद- प्रिंट मीडिया

तेज़ी से पैर पसारते डिजिटल मीडिया के युग में ये दुर्लभ तस्वीर मैंने अपने मोबाइल से नॉएडा के सेक्टर- 4 में ली थी ।





#प्रिंटबनामडिजिटल  

! तू जब बिछड़ेगी !

!! तू जब बिछड़ेगी तो कयामत होगी कम फ़िर भी न किसी क़ीमत पर मेरी चाहता होगी !!
!! तेरी बातों को यादकर हसेंगे-रोयेंगे संग तेरे बिता हर लम्हा मेरी ताउम्र की दौलत होगी !!
!! रख लेना मुझे याद किसी बुरी याद की तरह फिर भी न कभी तुझसे कोई शिकायत होगी !!


!! लौट आने की तेरे दुआ हम रोज़ पढ़ेंगे न जाने किस घड़ी ख़ुदा की हमपर रहमत होगी !!
!! तेरी तस्वीरों से सजाऊंगा अपने घर की दीवारें हर घड़ी मेरे अंजुमन में तेरी ही महक होगी !!
!! तू जब बिछड़ेगी तो क़यामत होगी कम फ़िर भी न किसी क़ीमत पर मेरी चाहता होगी !!

लगता है ज़मीन दरकने लगी है !

सय्यादीन दाऊदी बोहरा- मुस्लिम बोहरा समुदाय के जबरदस्ती वाले धर्मगुरु, ये और इनका पूरा कुनबा ख़ुद तो आलीशान कोठियों-महलों में आधुनिक जीवनशैली के हर मज़े लेता है। मगर ये अपने अनुयायियों को इस्लाम के हिसाब से जीने के तौर तरीकों पर वाज़ फ़रमाते हैं।


इनके समुदाय में धर्मगुरु बनने के लिए न कोई शिक्षा की ज़रूरत होती है न ही किसी और ख़ास तज़ुर्बा की। बस पीढ़ी दर पीढ़ी ख़ानदानी कुर्सी बदलती रहती है। ये गुरुघंटाल इतने तेज़ निकले कि उसमें भी बेईमानी कर गए। मतलब जो कुर्सी इनके अब्बा के इंतकाल के बाद क़ायदे से इनके चचा को मिलनी थी उसपर भी ज़बरदस्ती का कब्ज़ा जमाकर बैठ गए। चचा और उनका लोग अब बॉम्बे हाईकोर्ट में केस लड़ रहे हैं।


साथ ही ये इस्लाम के उसूलों के इतने पाबंद है कि आजतक मासूम बच्चियों के ख़तना को जारी रखा हुआ है। जबकि पश्चिमी देशों में ऐसा करने वाले लोगों और गुरुओं को कड़ी सज़ा दी जाती है। इस मामले में भी ये कोर्ट केस झेल रहे हैं।


अब बात हमारे प्रधान सेवक जी की जिनको इनसे न मिलने के लिए इस्लामिक रिफॉर्मर ने पत्र लिखकर गुज़ारिश की थी कि इनसे न मिलें। मगर हमारें प्रधान सेवक की ज़मीन अब दरकने लगी है। स्वर्ण हिन्दू …

कौन हूँ मैं ???

!! हर बार आँख खुलती तो सोचता हूँ कि कौन हूँ मैं , ध्यान से जब दर्पण देखा,परेशानियों से घिरा एक मानव हूँ मैं !!
!! दुःख में तकलीफ से जूझता हूँ मैं आंसू भी निकलते हैं तो पोंछ लेता हूँ मैं !!
!! लोगों ने कहा कि गुज़रा हुआ कल हूँ मैं, समय के साथ हमेशा झगड़ लेता हूँ मैं !!
!! न जाने कल क्या होगा ये सोचकर आदर-अनादर सब भूल जाता हूँ मैं !!
!! बाद में सोचकर पछताता हूँ मैं कभी मन में बैर नहीं रखता हूँ मैं!!
!! फिर भी लोग सोचते हैं कि कितना फ़ालतू हूँ मैं, हक़ीक़त मैं आखिर कौन हूँ मैं !!

!! भगवान को किनारे कर आगे बढ़ जाता हूँ मैं फिर सोचता हूँ कि ऐसा क्यों करता हूँ मैं !!
!! चाहत को भी अपनी पा न सका हूँ मैं उसके लौटने के इंतज़ार मैं बैठा हूँ मैं !!
!! आँख बंदकर विश्वास कर लेता हूँ मैं

धर्म या तो इंसान को अंधविश्वासी बनाता है या फिर आतंकवादी!

ये एक शवयात्रा का दृश्य है। जैन मुनी तरुण सागर की शवयात्रा। कहते हैं कि जैन धर्म की मूल जड़ सनातन धर्म से ही जुड़ी हुई है। इसका उदय  भी सिख पंथ की तरह हिन्दू धर्म के आडंबरों से मुक्ति पाने के लिए हुआ था।


मगर क्या इस तस्वीर में शवयात्रा का ये तरीका किसी घोर धार्मिक आडंबर से कम है? क्या समय के साथ सभी धर्मों को देश-दुनिया के सामाजिक परिवर्तन के साथ ख़ुद को     इतना भी अपडेट नहीं करना चाहिए कि उनके गुरु की अंतिम यात्रा थोड़ी  सम्मानजनक तरीक़े से निकाल पाए?

क्यों हर धर्म और उसके अनुयायी पढ़ने-लिखने के बावजूद आज भी लकीर के फ़क़ीर बने फिरते हैं? क्यों हर धर्म समुदाय के ठेकेदारों ने समय के साथ उसी नई व्यवस्थाओं को स्वीकार किया जो उनके अनुकूल थी और बाकी के बदलावों  को हराम और हलाल, धार्मिक और अधार्मिक कृत्य में वर्गीकृत कर दिया?


क्या ये अपने आप में धर्म के नाम पर धर्म के साथ किसी छलावे से कम है कि आज भी मौलाना फ़तवे जारी कर मुसलमानों को ये बताते हैं कि इंश्योरेंस पॉलिसी न बनवाएं ये इस्लाम में हराम है।
क्यों आज भी जीवहत्या को धार्मिक आधार पर सही और गलत बताया जाता है। जो हिन्दू धर्मलम्बी गौ हत्या को पाप बता…

जीवन की जंग

दोस्तों हर किसी के जीवन में एक क्षण ऐसा आता है जब हम खुद को हारा हुआ मानने लगते है। फिर चाहे बात उम्र के उस पड़ाव की हो जहां इंसान अपनी बढ़ती ज़िम्मेदारियों के बोझ से परेशान होकर हार मानने लगता है या फिर उन नौजवानों की जो वक़्त पर करियर में सेट नहीं हो पाने के कारण परेशान होते हैं या फिर उन स्कूल स्टूडेंट्स की जिनके इम्तेहान के रिजस्ट्स उनके मुताबित नहीं आने पर अपना साहस खो देते हैं। कई बार तो दोस्तों लोग इन सारी घटनाओं से इतने विचलित हो जाते हैं कि अपनी जीवन लीला ही समाप्त कर लेते हैं। जबकि एक पक्षी के जीवनचक्र से प्रेरित आज की हमारी कहानी ऐसी ही परिस्थितियों से लड़ने के लिए प्रेरित करती हैं। जब हम हताश होकर खुद को हारा हुआ मनाने लगते हैं। 
बाज़ लगभग 70 वर्ष जीता है, परन्तु अपने जीवन के 40वें वर्ष में आते-आते उसे एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना पड़ता है। उस अवस्था में उसके शरीर के तीन प्रमुख अंग पंजे, चोंचऔरपंख निष्प्रभावी होने लगते हैं। पंजे लम्बे और लचीले हो जाते है वह शिकार पर पकड़ बनाने में अक्षम होने लगते हैं।चोंच आगे की ओर मुड़ जाती है और भोजन निकालने में व्यवधान उत्पन्न करने लगती है।पंख भा…