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तो क्या ऐसे खत्म होगा भ्रष्ट्राचार , कालाधन ?

जिन्हे लगता है कि मौजूदा केंद्र सरकार आज़ाद भारत कि सबसे ईमानदार सरकार है और प्रधानमन्त्री मोदी पर तो आप चवन्नी कि हेराफेरी का आरोप लगाने का दुस्साहस भी नहीं कर सकते, वो ज़रूर पढ़ें।  

भारतीय राजनीति में राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे के लिए कई नियमों में से एक नियम हैं/था कि यदि कोई भी राजनीतिक दल 20000 से ज़्यादा का चंदा अपने किसी भी शुभचिंतक से लेता है तो राजनीतिक दल को उस शुभचिंतक का नाम सार्वजानिक करना पड़ता था/है। मगर नेहरू के वक़्त से लेकर अटल बिहार से होते हुए देश के सबसे ईमानदार प्रधानमंत्री मोदी जी तक हर राजनीतिक दल ने, सरकार ने ज़्यादातर दानकर्ताओं से प्राप्त चंदे को हमेशा 20000 से कम बताया। यानी कि जमकर काली कमाई में हिस्सेदारी ली। इसी प्रकार आरपी एक्ट की धारा 29 सी के तहत अब भी 20,000 रुपये तक का चंदा बिना किसी हिसाब-किताब के लिया जा सकता है. इसलिए राजनीतिक चंदे में जवाबदेही या पारदर्शिता पर भी कोई असर पड़ता नहीं दिख रहा

सनद रहे कि आज के वक़्त में भाजपा देश कि सबसे धनी राजनीतिक पार्टी है जिसे पिछले सालों सबसे ज़्यादा राजनीतिक चंदा मिला है। जिस चंदे के पैसों से प्रधानमंत्री बनने के पहले मोदी देशभर में अपना और अपनी पार्टी का प्रचार करते रहे हैं, कहते रहे है कि वो प्रधानमंत्री बने तब कालधन रखने वाले जेल जाएंगे।  मगर वे खुद किस सफ़ेद चंदे से चुनाव लड़कर आये हैं वो ये नहीं बताएंगे।  


अब बात करते है इस राजनीतिक चंदे के नियम में हुए ताज़ा बदलाव की! नए नियम के अनुसार यदि कोई व्यक्ति, संस्था समाजसेवी संस्था, कॉर्पोरेट घराना किसी राजनीतिक पार्टी को चंदा देना चाहता तब 2000 से ज़्यादा का चंदा उसे ऑनलाइन बैंकिंग प्रक्रीया के ज़रिये, चेक के जरिया या फिर इलेक्टोरल बांड के द्वारा देना होगा। ये सुनने में बेहद अच्छा लगता है कि सरकार अब ऐसा कानून बना रही है जिससे पारदर्शित आएगी।कि, अगर कोई दानकर्ता 2000 से ज़्यादा चंदा देगा तो उसे बैंकिंग प्रक्रीया से होकर गुज़ारना होगा। मगर सरकार ने इस नियम को बनाने में जो बड़ी चालाकी खेली वो आम जनता के साथ कितना बड़ा विश्वास घात है इसे समझना भी ज़रूरी है। 
नए नियम के अनुसार किसी भी राजनीतिक दल को जितना मर्ज़ी चंदा बैंकिंग प्रक्रीया के ज़रिये, चेक के जरिया या फिर इलेक्टोरल  बांड के द्वारा कोई भी अदृश्य दानकर्ता दे सकता है इसमें न तो देने वाला दानकर्ता को उस राजनीतिक दल का नाम बताने के लिए कोई क़ानूनी बाध्यता है न ही चंदा लेने वाले दल पर ऐसी जिम्मेदारी कि वो अपने दानकर्ता का नाम उजागर करें। ऐसे में बहुतेरे गंभीर सवाल मौजूदा सरकार कि भ्रष्ट्रचार, कालाधान के विरुद्ध कथित लड़ाई पर प्रश्नचिन्ह लगते है।


वही बात-बात पर मौजूदा सरकार के कार्यकलापों पर सवाल खड़ा करने वाला विरोध करने वाल विपक्ष भी आँखे मूँदकर बिना किसी विरोध के इस नियम का बिल का स्वागत कर चूका है।



ऐसे में-
सवाल नंबर-1
किस व्यक्ति, समाजसेवी संस्था, कॉर्पोरेट घराना द्वारा कौन सा घोटाला कर पैसा कमाया गया और सरकारों राजनीतिक दलों को साधा गया जनता को कैसा पता चलेगा?  क्या ये देशहित हैं

सवाल नंबर-2
विदेशी कंपनियां, समाज सेवी संस्थाएं जिनसे संघ विचारकों के खासे मतभेद है वो अपना कौन सा ऐजेंडा सेट करने के लिए किस राजनीतिक दल से क्या डील करती है उससे देश के आम नागरिक क्या फायदा नुकसान होगा ये कैसे पता चलेगा?

सवाल नंबर-3

क्या इससे राजनीतिक भ्रष्ट्रचार कम होगा अगर हाँ तो कैसे अगर नहीं तो फिर मोदी जी के कालाधान ख़त्म करने कि मुहीम का क्या हुआ?

सवाल नंबर-4
क्या इससे व्यक्ति,संस्था समाजसेवी संस्था,कॉर्पोरेट घराना आदि को ये मैसेज नहीं जाता कि आप कोई भी घोटाला करिये बाद में सरकार को इलेक्ट्रोल बांड खरीद कर दे देना बात ख़तम। क्योंकि किसी को पता भी नहीं चल पाएगा कि ये घोटाले करने वाले दल ने मामला ठंडा करने के लिए सरकार को चढ़ावा दिया है कितना चढ़ावा दिया है डील कितने में हुए ये तो शायद कभी न पता चले। ऐसे कई सवाल है जिनका सरकार जवाब नहीं देना चाहती ऐसे में कोई कैसे कहे कि मोदी जी देश से कालाधन ख़त्म करना चाहते है वो एक ईमानदार प्रधानमन्त्री है उनके ऊपर भ्रष्ट्राचार के आरोप लगाना गुनाह है?

सवाल नंबर-5
पुराने नियम में जहां 20000 से ऊपर चंदा प्राप्त होने पर दानकर्ताओं के नाम बताना ज़रूरी था तब अधिकांश राजनीतिक दलों ने एक ही तरह का खेल-खेल कर ज़्यादातर दानकर्ताओं से प्राप्त करोड़ों के चंदे कि रक़म को हमेशा 20000 से नीचे बताया। तब क्या एवं क्यों वो नए नियम के तहत इसका नाज़ायज़ फायदा कालाधन को ठिकाने लगाने में नहीं करेंगे जिसका हिसाब मांगने का हक़ किसी के पास नहीं होगा।

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