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इसलिए ज़रूरी है हर हीरे की पहचान

बहुत पुरानी बात है एक दिन किसी गाँव के पास के जंगल से एक चरवाहा अपनी भेड़-बकरियां चराकर वापस लौट रहा था। पास ही नदी के किनारे गाँव के कुछ बच्चे खेल रहे थे। वहीँ खेलते-खेलते बच्चों के झुण्ड में से किसी एक बच्चे को रेत में दबा एक बहुत खूबसूरत चमकीला पत्थर मिला। सभी बच्चों ने उसे देखा और उस पत्थर की खूबसूरती की तारीफ की मगर कोई भी उस पत्थर की सही पहचान नहीं कर पाया, ये उनकी आयु अनुसार अर्जित ज्ञान का अभाव था।

पास से गुजरते हुए चरवाहे ने जब बच्चों के हाथों में वो चमकीला पत्थर देखा तो बड़ी उत्सुकता से उसे अपने हाथों में लेने के लिए बच्चों की ओर गया। वहां बच्चों ने बड़ी आसानी से वो चमकीला पत्थर उस चरवाहे के हाथों में दे दिया, बच्चे थे। वो कहाँ उस चमकीले पत्थर का मोल समझते थे। खैर मोल तो वो चरवाहा भी नहीं समझता था कि आखिर ये खूबसूरत पत्थर है क्या। मगर उसे वो पत्थर भा गया।  

उसने बच्चे से पूछा कि क्या वो ये पत्थर रख सकता है बदले में वो उस बच्चे को अपनी एक बकरी का दूध अभी निकाल कर पिलाएगा।  
बच्चा खुश हो गया उसने कहा ठीक है, सौदा हो गया बच्चे को बकरी का दूध मिल गया और बदले में उसने वो चमकीला पत्थर चरवाहे को दे डाला। चरवाहे कि तमन्ना थी कि वो इस पत्थर को अपनी सबसे खूबसूरत बकरी के गले में हार कि तरह पीरों कर पहनाए सो उसने ऐसा ही किया। 

उसने किसी तरह उस पत्थर को एक धागे में पिरोया और सुबह-सुबह जंगल में जाने से पहले अपनी सबसे पसंदीदा बकरी के गले में माला बनाकर पहना दिया। बकरी बेचारी एक बेज़ुबान जानवर थी उसके लिए इस चमकीले पत्थर का भला क्या मोल वो न तो खुश हुई  न ही उसने उस हार को न पहनने के लिए कोई विरोध किया। मगर उस दिन चरवाहा बड़ा खुश रहा।  

भर दिन वो अपनी उस बकरी के इर्द-गिर्द मंडराता रहा जब कभी सूरज कि किरणे उस पत्थर से टकराती बहुत ही खूबसूरत इंदरधनुषी रौशनी उस चमकीले पत्थर से फूटने लगती। चरवाहा ये देखकर बड़ा खुश होता, इतराता मन ही मन सोचता वह क्या खूबसूरत पत्थर मिल गया वो भी बस एक सेर बकरी के दूध के बदले, वाकई इसने मेरी प्यारी बकरी कि खूबसूरती चौगनी कर दी है। कुछ दिन ये खेल यूँ ही चलता रहा।  
एक शाम जब चरवाहा जंगल से अपनी भेड़-बकरियों को लेकर वापस लौट रहा था तभी नगर के एक लालची जौहरी कि निगाह उस बकरी के गले में लटक रहे चमकीले पत्थर पर पड़ गयी। उसने गिरते- सँभालते उस चरवाहे को आवाज़ लगानी शुरू कर दी। चरवाहे ने जब देखा कि नगर का जाना-माना जौहरी उसे ही आवाज़ लगा रहा है तब वो हाथ जोड़े उसके पास पहुंच गया और कहा जी हज़ूर आपने मुझे बुलाया।'

जौहरी ने अपनी आवाज़ को थोड़ा सख्त किया और बोला ' हाँ, ये क्या डाल रखा है तुमने अपनी बकरी के गले में?' चरवाहे ने गौर से जौहरी फिर अपनी बकरी के गले के चमकीले पत्थर को देखा और बोला वो हज़ूर कुछ बच्चों के हाथ नदी किनारे खेलते हुए ये चमकीला पत्थर लग गया था बाद में मुझे बड़ा अच्छा लगा तो मैंने इसे उन बच्चों से एक सेर बकरी के दूध के बदले मांग लिया। ये मेरी सबसे प्यारी बकरी है इसलिए मैंने इस पत्थर कि माला बनाकर उसके गले में पीरों दी।' 


जौहरी के शैतानी दिमाग कि घंटियां ख़ुशी के मारे ज़ोर-ज़ोर बजने लगी। उसने अपने बात करने के सख्त लहज़े को मसखरे पन में बदलते हुए कहा 'ओह्ह हो हो अच्छा अच्छा कोई बात नहीं। दरअसल ये चमकीला पत्थर देखने में है तो बड़ा खूबसूरत मगर तुम्हे शायद इस बात का अंदाज़ा न हो कि ये जानवरों के लिए सही चीज़ नहीं है। अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हें इसे मुझे देकर एक इससे बढ़िया और बड़ा पत्थर दे दूंगा।वो भी बिना कोई अतिरिक्त कीमत चुकाए।चरवाहे ने सोचा ये तो और भी अच्छा है तो उसने जौहरी के साथ अपने चमकीले पत्थर कि बदली कर ली बदले में जौहरी ने उसे एक साधारण चमकीले कांच का टुकड़ा दे दिया। 

जौहरी ने पत्थर उतारकर अपने कुर्ते कि जेब में रख लिया। चरवाहे ने जौहरी को हाथ जोड़े और अपनी बस्ती कि ओर बढ़ गया। 
उधर कि ख़ुशी का ठिकाना नहीं था उसके हाथ लाखों का हीरा लग चूका था अब वो उसे बेचकर लाखों कि कमाई के सपने देखने लग गया।
जौहरी ने मन ही मन सोचा कि कल सुबह ही इस हीरे को तराश कर नगर राजा के यहां ले जाऊंगा अच्छे दाम मिल जाएंगे। मैं आस पास के दस नगरों का सबसे धनवान जौहरी बन जाऊंगा। फिर जौहरी साडी रात शेख चिल्ली वाले सपने देखता रहा। सुबह दूकान पर पहुंचते ही उसने हीरा निकाल कर अपने सामने रखा और उसे साफ़ करने वाला द्रव्य एक कपड़े में लगाकर उसकी सफाई करने लग गया। सफाई के दौरान अचानक हीरा कपड़े से फिसलकर ज़मीन पर जा गिरा और कई छोटे-बड़े टुकड़ों में बिखर गया।

जौहरी का तो मानों दिल हो मुंह में आ गया। वो ज़ोर-ज़ोर से दहाड़े मारकर रोने लगा। गुस्से में उसने हीरे के बिखरे टुकड़ों कि  ओर देखते हुए कहा 'अरे मैं तो तुम्हें तराश कर और भी खूबसूरत बनाना चाहता था और तुमने ये क्या कर दिया? खुद का नुकसान तो कराया ही साथ ही मेरा भी लाखों ले डूबे।'


तभी हीरे से एक साथ कई कर्कश आवाज़े निकलने लगी 'ओ बेईमान जौहरी ये मगरमच्छ के आंसू मुझे मत दिखा। मुझे पता है कि क्यों तू मुझे तराशने में इतनी दिलचस्पी ले रहा था ताकि तू मुझे राजा को बेचकर लाखों कमा सके, हैं न?  मगर तूने मेरी जो कीमत उस चरवाहे को अदा कि क्या वो मेरी सही कीमत थी?' जौहरी ने देखा कि आवाज़ तो हीरे के टुकड़ों से आ रही है उसने फिर कहा 'अरे मगर मैं तो तुम्हें उस जंगली बकरी के गले से निकल कर लाया हूँ। छप्पर वाले चरवाहे के घर से राजा के मुकुट में सजने के लिए लाया था।'
हीरे से फिर आवाज़ आयी मगर अपनी लालच के लिए लाया है न कि मेरे लिए अगर तुझे मेरी फ़िक्र होती तो तू उस चरवाहे को मेरी सम्मानजनक कीमत अदाकर खरीदता। मगर तूने वहां छल किया उसे तूने मेरी कीमत एक मामूली पत्थर वाली बताई जबकि तू मेरी कीमत जानता था कि मैं एक बेशकीमती हीरा हूँ। मेरी असल कीमत न तो वो चरवाहा जानता था न उसकी बकरी और न ही वो अबोध बच्चा मगर तूने मेरा सम्मान नहीं किया। बस मुझे राजा को बेचकर एक मोटी कीमत वसूलना चाहता था 

यही तेरी लालच थी, यही तेरा उद्देश्य था। इसलिए इससे पहले कि तू मुझे राजा को बेचकर अपने सुख के लिए धन अर्जित करता मैंने स्वयं ही अपना अस्तित्व समाप्त करना सही समझा। ये तेरे लिए एक सीख है कि अगर तू जौहरी है तो हीरे कि सही कीमत लगाना भी तेरी नैतिक ज़िम्मेवारी है। वरना यदि हीरा बुरा मान गया तो वो तेरा नुकसान ज़रूर करवाएगा।

दोस्तों ये कहानी उन सभी मालिक,बॉसेज़ के लिए है जो अपने हीरे जैसे कर्मचारियों का सही मोल जानते है। वो जानते है कि कौन सा एम्प्लॉई सही मायने में उनके लिए किसी हीरे से कम नहीं और कौन सा कर्मचारी एक साधारण चमकीला पत्थर मात्र है। मगर फिर भी वो अपने हीरे जैसे कर्मचारियों साथ अतिसाधारण व्यवहार करते है अपने बॉस कि ये आदत उनके हीरे से कर्मचारियों को इस कहानी के हीरे कि तरह  मजबूरन टूट जाने पर मजबूर करती है, जिसका नुकसान उनके मालिकों को उठाना पड़ता है।              
           
       

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