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सितंबर, 2018 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

लगता है ज़मीन दरकने लगी है !

सय्यादीन दाऊदी बोहरा- मुस्लिम बोहरा समुदाय के जबरदस्ती वाले धर्मगुरु,  ये और इनका पूरा कुनबा ख़ुद तो आलीशान कोठियों-महलों में आधुनिक जीवनशैली के हर मज़े लेता है। मगर ये अपने अनुयायियों को इस्लाम के हिसाब से जीने के तौर तरीकों पर वाज़ फ़रमाते हैं। इनके समुदाय में धर्मगुरु बनने के लिए न कोई शिक्षा की ज़रूरत होती है न ही किसी और ख़ास तज़ुर्बा की। बस पीढ़ी दर पीढ़ी ख़ानदानी कुर्सी बदलती रहती है। ये गुरुघंटाल इतने तेज़ निकले कि उसमें भी बेईमानी कर गए। मतलब जो कुर्सी इनके अब्बा के इंतकाल के बाद क़ायदे से इनके चचा को मिलनी थी उसपर भी ज़बरदस्ती का कब्ज़ा जमाकर बैठ गए। चचा और उनका लोग अब बॉम्बे हाईकोर्ट में केस लड़ रहे हैं। साथ ही ये इस्लाम के उसूलों के इतने पाबंद है कि आजतक मासूम बच्चियों के ख़तना को जारी रखा हुआ है। जबकि पश्चिमी देशों में ऐसा करने वाले लोगों और गुरुओं को कड़ी सज़ा दी जाती है। इस मामले में भी ये कोर्ट केस झेल रहे हैं। अब बात हमारे प्रधान सेवक जी की जिनको इनसे न मिलने के लिए इस्लामिक रिफॉर्मर ने पत्र लिखकर गुज़ारिश की थी कि इनसे न मिलें। मगर हमारें प्रधान सेवक की ज़मीन अब दरकने

कौन हूँ मैं ???

!! हर बार आँख खुलती तो सोचता हूँ कि कौन हूँ मैं , ध्यान से जब दर्पण देखा , परेशानियों से घिरा एक मानव हूँ मैं !! !! दुःख में तकलीफ से जूझता हूँ मैं आंसू भी निकलते हैं तो पोंछ लेता हूँ मैं !! !! लोगों ने कहा कि गुज़रा हुआ कल हूँ मैं , समय के साथ हमेशा झगड़ लेता हूँ मैं !! !! न जाने कल क्या होगा ये सोचकर आदर - अनादर सब भूल जाता हूँ मैं !! !! बाद में सोचकर पछताता हूँ मैं कभी मन में बैर नहीं रखता हूँ मैं !! !! फिर भी लोग सोचते हैं कि कितना फ़ालतू हूँ मैं , हक़ीक़त मैं आखिर कौन हूँ मैं !! !! भगवान को किनारे कर आगे बढ़ जाता हूँ मैं फिर सोचता हूँ कि ऐसा क्यों करता हूँ मैं !! !! चाहत को भी अपनी पा न सका हूँ मैं उसके लौटने के इंतज़ार मैं बैठा हूँ मैं !! !! आँख बंदकर विश्वास कर लेता हूँ मैं जो अपना ना हो उसे भी अपना लेता हूँ मैं !! !! जानकर भी ज्ञान से अज्ञानी हूँ मैं ये समझ नहीं आता के आखिर कौन हूँ मैं !! !! उजाले के भी पीछे छुपकर खड़ा हूँ मैं समझ नहीं आता क्या कर रहा हूँ मैं !! !! टिपण्णी सब देने लगे अलग - अलग भावनाओं

धर्म या तो इंसान को अंधविश्वासी बनाता है या फिर आतंकवादी!

ये एक शवयात्रा का दृश्य है। जैन मुनी तरुण सागर की शवयात्रा। कहते हैं कि जैन धर्म की मूल जड़ सनातन धर्म से ही जुड़ी हुई है। इसका उदय  भी सिख पंथ की तरह हिन्दू धर्म के आडंबरों से मुक्ति पाने के लिए हुआ था।   मगर क्या इस तस्वीर में शवयात्रा का ये तरीका किसी घोर धार्मिक आडंबर से कम है? क्या  समय के साथ सभी धर्मों को देश-दुनिया के सामाजिक परिवर्तन के साथ ख़ुद को     इतना भी अपडेट नहीं करना चाहिए कि उनके गुरु की अंतिम यात्रा थोड़ी  सम्मानजनक तरीक़े से निकाल पाए? क्यों हर धर्म और उसके अनुयायी पढ़ने-लिखने के बावजूद आज भी लकीर के फ़क़ीर बने फिरते हैं? क्यों हर धर्म समुदाय के ठेकेदारों ने समय के साथ उसी नई व्यवस्थाओं को स्वीकार किया जो उनके अनुकूल थी और बाकी के बदलावों  को हराम और हलाल, धार्मिक और अधार्मिक कृत्य में वर्गीकृत कर दिया? क्या ये अपने आप में धर्म के नाम पर धर्म के साथ किसी छलावे से कम है कि आज भी मौलाना फ़तवे जारी कर मुसलमानों को ये बताते हैं कि इंश्योरेंस पॉलिसी न बनवाएं  ये  इस्लाम में हराम है। क्यों आज भी जीवहत्या को धार्मिक आधार पर सही और गलत बताया जाता है। जो हिन्दू धर