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लगता है ज़मीन दरकने लगी है !

सय्यादीन दाऊदी बोहरा- मुस्लिम बोहरा समुदाय के जबरदस्ती वाले धर्मगुरु, ये और इनका पूरा कुनबा ख़ुद तो आलीशान कोठियों-महलों में आधुनिक जीवनशैली के हर मज़े लेता है। मगर ये अपने अनुयायियों को इस्लाम के हिसाब से जीने के तौर तरीकों पर वाज़ फ़रमाते हैं।


इनके समुदाय में धर्मगुरु बनने के लिए न कोई शिक्षा की ज़रूरत होती है न ही किसी और ख़ास तज़ुर्बा की। बस पीढ़ी दर पीढ़ी ख़ानदानी कुर्सी बदलती रहती है। ये गुरुघंटाल इतने तेज़ निकले कि उसमें भी बेईमानी कर गए। मतलब जो कुर्सी इनके अब्बा के इंतकाल के बाद क़ायदे से इनके चचा को मिलनी थी उसपर भी ज़बरदस्ती का कब्ज़ा जमाकर बैठ गए। चचा और उनका लोग अब बॉम्बे हाईकोर्ट में केस लड़ रहे हैं।


साथ ही ये इस्लाम के उसूलों के इतने पाबंद है कि आजतक मासूम बच्चियों के ख़तना को जारी रखा हुआ है। जबकि पश्चिमी देशों में ऐसा करने वाले लोगों और गुरुओं को कड़ी सज़ा दी जाती है। इस मामले में भी ये कोर्ट केस झेल रहे हैं।


अब बात हमारे प्रधान सेवक जी की जिनको इनसे न मिलने के लिए इस्लामिक रिफॉर्मर ने पत्र लिखकर गुज़ारिश की थी कि इनसे न मिलें। मगर हमारें प्रधान सेवक की ज़मीन अब दरकने लगी है। स्वर्ण हिन्दू क्षुब्ध हैं, दलित का भरोसा 5 साल में 5 दिन के लिए भी नहीं जीत पाएं। इसलिए अब यहां माथा टेकने चले आए है। जबकि पिछले 5 सालों से मोदीजी खुद को इस्लाम का रिफॉर्मर बताते नहीं थकते।

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कादर खान- मुफ़्लिसी से मस्खरी के उस्ताद तक का सफ़र !

81 साल की उम्र में बॉलीवुड के हास्य अभिनेता एवं हिंदी फिल्मों के जाने माने अभिनेता कादर खान का निधन (Kadar Khan Died) हो गया। भारतीय फिल्मों (Indian Movies) के ज़्यादातर दर्शक कादर खान को उनके कॉमेडी वाले रोल्स के लिए जानते हैं। मगर असल मायनों में कादर खान का शुरूआती जीवन कितना संघर्ष भरा और दुखदायी रहा उसकी जानकारी शायद ही किसी को हों। मेरे इस ख़ास ब्लॉग में पढ़िए कादर खान की जिंदगी से जुड़े कुछ सच्चे किस्सों को...
कादर खान का परिवार मूलतः काबुल का रहनेवाला था। वे वहींएक मुस्लिम परिवार मेंजन्मे थें। उनके वालदैन बेहद ग़रीब थे। एक तरह से कहें तो खाने के लाले थे। कादर खान से पहले उनके तीन भाई और थे जो सभी आठ साल के होते-होते मर गए। जब कादर खान पैदा हुए, तब उनकी माँ का अपनी पिछली औलादों की मौत का डर फिर से उन्हें परेशान करने लगा। उन्हें लगा कि ये जगह उनके बेटे के लिए सही नहीं हैं। वे बेहद डरी हुई थीं ” उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वे कहाँ जाए। बहरहाल वे वहाँ से अपने पति के साथ निकल पड़ी और पता नहीं कैसेवेआजके मुंबई पहुँच गए। अनजाना मुल्क, अनजान शहर। न कोई जान-पहचान वाला न ही पास में एक धेला।

कौन हूँ मैं ???

!! हर बार आँख खुलती तो सोचता हूँ कि कौन हूँ मैं , ध्यान से जब दर्पण देखा,परेशानियों से घिरा एक मानव हूँ मैं !!
!! दुःख में तकलीफ से जूझता हूँ मैं आंसू भी निकलते हैं तो पोंछ लेता हूँ मैं !!
!! लोगों ने कहा कि गुज़रा हुआ कल हूँ मैं, समय के साथ हमेशा झगड़ लेता हूँ मैं !!
!! न जाने कल क्या होगा ये सोचकर आदर-अनादर सब भूल जाता हूँ मैं !!
!! बाद में सोचकर पछताता हूँ मैं कभी मन में बैर नहीं रखता हूँ मैं!!
!! फिर भी लोग सोचते हैं कि कितना फ़ालतू हूँ मैं, हक़ीक़त मैं आखिर कौन हूँ मैं !!

!! भगवान को किनारे कर आगे बढ़ जाता हूँ मैं फिर सोचता हूँ कि ऐसा क्यों करता हूँ मैं !!
!! चाहत को भी अपनी पा न सका हूँ मैं उसके लौटने के इंतज़ार मैं बैठा हूँ मैं !!
!! आँख बंदकर विश्वास कर लेता हूँ मैं

! तू जब बिछड़ेगी !

!! तू जब बिछड़ेगी तो कयामत होगी कम फ़िर भी न किसी क़ीमत पर मेरी चाहता होगी !!
!! तेरी बातों को यादकर हसेंगे-रोयेंगे संग तेरे बिता हर लम्हा मेरी ताउम्र की दौलत होगी !!
!! रख लेना मुझे याद किसी बुरी याद की तरह फिर भी न कभी तुझसे कोई शिकायत होगी !!


!! लौट आने की तेरे दुआ हम रोज़ पढ़ेंगे न जाने किस घड़ी ख़ुदा की हमपर रहमत होगी !!
!! तेरी तस्वीरों से सजाऊंगा अपने घर की दीवारें हर घड़ी मेरे अंजुमन में तेरी ही महक होगी !!
!! तू जब बिछड़ेगी तो क़यामत होगी कम फ़िर भी न किसी क़ीमत पर मेरी चाहता होगी !!