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कादर खान- मुफ़्लिसी से मस्खरी के उस्ताद तक का सफ़र !

81 साल की उम्र में बॉलीवुड के हास्य अभिनेता एवं हिंदी फिल्मों के जाने माने अभिनेता कादर खान का निधन (Kadar Khan Died) हो गया। भारतीय फिल्मों (Indian Movies) के ज़्यादातर दर्शक कादर खान को उनके कॉमेडी वाले रोल्स के लिए जानते हैं। मगर असल मायनों में कादर खान का शुरूआती जीवन कितना संघर्ष भरा और दुखदायी रहा उसकी जानकारी शायद ही किसी को हों। मेरे इस ख़ास ब्लॉग में पढ़िए कादर खान की जिंदगी से जुड़े कुछ सच्चे किस्सों को...   

कादर खान का परिवार मूलतः काबुल का रहनेवाला था। वे वहीं एक मुस्लिम परिवार में जन्मे थें। उनके वालदैन बेहद ग़रीब थे। एक तरह से कहें तो खाने के लाले थे। कादर खान से पहले उनके तीन भाई और थे जो सभी आठ साल के होते-होते मर गए। जब कादर खान पैदा हुएतब उनकी माँ का अपनी पिछली औलादों की मौत का डर फिर से उन्हें परेशान करने लगा। उन्हें लगा कि ये जगह उनके बेटे के लिए सही नहीं हैं। वे बेहद डरी हुई थीं ” उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वे कहाँ जाए। बहरहाल वे वहाँ से अपने पति के साथ निकल पड़ी और पता नहीं कैसे वे आजके मुंबई पहुँच गए। अनजाना मुल्क, अनजान शहर। न कोई जान-पहचान वाला न ही पास में एक धेला।

जल्द ही वे मुंबई की सबसे बुरी झोपड़पट्टी वाले इलाके कमाठीपुरा जा पहुंचे। उस वक़्त इमारतें बनाने वाले सारे मजदूर वहाँ रहा करते थे। वहाँ का माहौल बेहद खराब था वेश्याएंअफ़ीमगांजाचरस और असामाजिक तत्वों का सबसे बड़ा ठिकाना। मगर इत्तेफाक देखिये कि कादर खान ने अपनी सिविल इंजीनियरिंग के डिप्लोमा (Diploma in Civil Engineering) की पढ़ाई उसी इलाके में रहकर की थी।

माँ ने दिया हौसला और दिखाई सही राह-
कभी-कभी जब कादर खान के घर में खाने को कुछ नहीं होता था तो अपनी पढ़ाई और ग़रीबी के बीच फंसे कदर खान का हौसला जब जवाब देने लगता। उन्होंने स्थानीय लड़कों को देखा था जो यहाँ-वहाँ मजदूरी कर अपना गुज़ारा करते थें। उन्होंने भी कोई मेहनत मजदूरी का काम कर घर चलाने का फैसला लेने की सोची। उन्होंने इस बावत इरादा भी कर ही लिया था कि किसी वर्कशॉपगैरेज या होटल में काम करना चाहिए। तभी, उनकी माँ नजाने कैसे उनकी परेशानी और बदलते इरादे को भांप गई। और उन्होंने कादर खान से कहा “मुझे  पता है तू कहाँ जा रहा है। मैं समझ सकती हूँ। तू कुछ लड़कों से बातें कर रहा था। तू भी दिन में दो या तीन रुपये कमाने वाला  काम खोजने जाने वाला है। लेकिन तेरे कमाए दो-तीन रुपयों से इस घर की गरीबी नहीं मिटने वाली। अगर तुझे इस घर की गरीबी मिटानी है तो तुझे पढ़ना होगा।” 

माँ की दी हुई नसीहत कादर खान अच्छी तरह समझ गए और उन्होंने अपना इरादा बदल दिया। उसके बाद उन्होंने अपना पूरा ज़ोर अपनी पढ़ाई पर डाल दिया  आपको बता दें कि कदर खान गणित के बहुत अच्छे जानकार थें इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए उन्हें गणित में बहुत सारे जोड़-भाग करने होते थे। इसके लिए वे चॉक का डिब्बा खरीद लाते। मगर कागज़ के पैसे बचाने के लिए वे सारे वक़्त फर्श पर लिखाई करते थें और फिर बाद में उसे मिटा देते। 

पिता भी थे पढ़े लिखें -
कादर खान के वालिद भी बहुत पढ़े-लिखे थे। उन्हें दस तरह की फ़ारसी और आठ तरह की अरबी का ज्ञान था। काबुल में वे किसी स्कूल में बतौर शिक्षक काम करते थें।  उनकी हस्तलिपि बहुत शानदार थी। लेकिन पढ़े-लिखे होने के बावजूद वे पैसे नहीं कमा पाते थें। काबुल से जब वे बम्बई आये तो एक मस्जिद में मौलवी बन गए। वहाँ वो दूसरों को अरबी सिखाया करते थे – अरबी व्याकरणफ़ारसीउर्दू। लेकिन उन्हें बदले में उन्हें बस चार या पांच या छः रुपये एक महीने के मिलते थें।

जब हो गया माँ-बाप का तलाक़
गरीबी की वजह से उनके माँ-बाप  में निभ न पाई। उनके वालिद घर की बुनियादी ज़रूरतें पूरी नहीं कर पाते थे। घर में हमेशा एक तनाव बना रहता था। इस वजह से दोनों अलग हो गए। कादर खान उस वक़्त  कोई चार- पांच साल के थे जब उनके माँ-बाप का तलाक हो गया था ।

तब उनके नाना, मामा मुंबई  आये और उन्होंने कहा “एक जवान औरत ऐसी गंदी जगह में बिना पति के नहीं रह सकती। तुम्हे शादी करनी होगी।” और उन्होंने कादर खान की माँ की फिर से शादी करा दी। इस तरह कादर खान को अपने जीवन के शुरूआती वक़्त में ही अपने पिता से अलग होना पड़ा और एक अंजाने इंसान को पिता के रूप में स्वीकारना पड़ा – एक असली पिताएक सौतेले। कादर खान के  माता-पिता अलग हो चुके थे पर दोनों के मन में एक दूसरे के लिए सहानुभूति थी। वे जानते थे कि उनका अलगाव गरीबी के कारण हुआ है।
सौतेले पिता से कादर खान की कभी नहीं पटी-
कादर खान की उनके सौतेले पिता से कभी नहीं जमी बकौल कादर खान वह किसी ड्रामा या स्क्रीनप्ले के सौतेले बाप जैसे थे – कठोर दिल वाले। एक दफ़ा मेरा नाटक ‘लोकल ट्रेन’ राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में पहुंचा। हमने बेस्ट प्ले,बेस्ट राइटर और बेस्ट एक्टर के अवार्ड्स जीते। मैं इन इनामों को माँ को दिखाने की नीयत से घर लाया।  सौतेले पिता उस दिन कादर खान से बात करने के मूड में नहीं थे। उन्होंने ट्राफी को देखा और वे आगबबूला होकर कादर खान को  पीटने लगे – उन्होंने पीट-पीट कर कादर खान  के शरीर को  नीला कर दिया और लतियाते हुए घर से बाहर निकाल दिया। कादर खान अपने संस्थान गया और प्रिंसिपल के दरवाज़े पर बैठकर उनसे बातचीत की। प्रिंसिपल बोले, “अगर तूम चाहो तो स्टाफ क्वार्टर्स में रह सकते हो।” उन्होंने कादर खान को  बांस की बनी एक खटियाबिस्तरकम्बल और तकिया दिया। उसके बाद कादर खान ने वहाँ रहना शुरू कर दिया।

बुरा वक़्त
तब कादर खान करीब 24 साल के थें जब वे अक्सर दोपहर के वक़्त अपनी माँ से मिलने जाया करते थे। वे कादर खान को वापस आ जाने को कहती थीं। मगर कादर खान मना कर दिया करते। वे कहते मैं तुम्हारे प्यार के लिए आता हूँ। मगर मेरे भीतर एक आत्मसम्मान भी है जो मुझे यहाँ आने से रोकता है। 
यह बेवकूफ फिल्म इंडस्ट्री में क्यों नहीं आ रहा?
तो वह कौन सा लम्हा था जब जब कादर खान अध्यापन और लेखन अभिनय से अचानक सिनेमा में पहुंच  गए?  दरअसल फिल्म इंडस्ट्री के लोग नियमित रूप से थियेटर देखने जाया करते थे। उन्होंने कादर खान का नाम सुना था। उन्होंने कादर खान के थियेटर भी देंखे थे। और फिर एक वक़्त के बाद उन्हीं में से कुछ लोगों ने ये कहना शुरू कर दिया “यह बेवकूफ फिल्म इंडस्ट्री में क्यों नहीं आ रहाइसमें प्रतिभा है। इसे फिल्म इंडस्ट्री में होना ही चाहिए।” जब कादर खान को ‘लोकल ट्रेन’ नामक उनके नाटक के लिए एक अवार्ड मिला तो अगले दिन एक निर्माताकुछ निर्देशक और लेखक पास आकर बोले “आप फ़िल्में ज्वाइन क्यों नहीं करते?”  बकौल कादर खान ये बात उनके लिए यह एक लतीफे जैसी थी। किसी ने कहा “आपको एक लेखक होना चाहिएआपको एक अभिनेता होना चाहिए। आप कुछ भी कर सकते हैं क्योंकि आपको सब कुछ आता है।

हालाँकि कादर खान ने फिल्मों में जाने के बारे में कभी नहीं सोचा था क्योंकि उन दिनों फिल्मों को अच्छी निगाह से नहीं देखा जाता था। एक निर्माता रमेश बहल ने उनसे कहा कि वो एक फिल्म बनाने जा रहे हैं ‘जवानी दीवानी’ (1972)।मैं चाहता हूँ आप इसके डायलॉग्स लिखें।जिसपर कादर खान ने जवाब दिया मुझे नहीं आता डायलॉग लिखना।तब उस डायरेक्टर ने कहा “आप जो कुछ अपने नाटकों के लिए लिखते हैंउसी को फिल्मों में डायलॉग्स कहा जाता है।” उसके बाद उन्होंने कादर खान को अपनी फिल्म के डायलॉग्स लिखने के लिए मना लिया। उन्होंने कहा कि वे अगले हफ्ते से शूटिंग शुरू करना चाहते हैं। वहीँ कादर खान के लिए चुनौती ये थी कि उनके पास रहने की जगह नहीं थी। सो उन्होंने अपने डायलॉग्स राइटिंग (dialogue writing) के पूरे काम को क्रॉस मैदान में बैठकर लिखा, जहां लोग फुटबॉल खेलते हैं। चार घंटे में हीं कादर खान ने (उर्दू में) स्क्रिप्ट लिख ली।
उसके बाद वे वापस उस डायरेक्टर के पास गए। तो वो डायरेक्टर स्क्रिप्ट देखकर बौरा सा गया। उसे लगा शायद “इसे  वो सीन समझ में ही नहीं आया। क्या! इतनी जल्दी! आज ही!
 कादर खान ने उन्हें जवाब में कहा लाइफ ऐसी ही है। जो डिसाइड करता हूँउसी दिन कर देता हूँ। आज ही फैसला हो जाए। अगर आपने मुझको काम पर लेना है तो ठीक वरना मुझे जाने दीजिये क्योंकि स्टूडेंट्स मेरा इंतज़ार कर रहे हैं।
उसके बाद कादर खान ने उन्हें अपना सब्जेक्ट और सीन पढ़कर सुनाया। वे उछल पड़े। बोले “फिर से!” कादर खान ने उनकों तीन या चार बार स्क्रिप्ट सुनाई। उन्होंने उसे रेकॉर्ड किया। और तीन दिन के अन्दर शूटिंग शुरू हो गयी। इस तरह कादर खान स्क्रिप्ट ने फिल्म की सूरत ली।

शेड्यूल के हिसाब से फिल्म दस दिन में शुरू होनी थी पर स्क्रिप्ट फाइनल होने के कारण वह तीन दिन में शुरू हो गयी। शूटिंग के दिनों में कादर खान को अतिरिक्त पब्लिसिटी भी मिली। इंडस्ट्री में अफवाह गर्म थी कि एक नया राइटर आया है जो बहुत आमफ़हम ज़बान लिखता है। और जिस तरह से वह सीन को नरेट करता हैअभिनेता के लिए परफॉर्म करना मुश्किल पड़ता है। पहली फिल्म के लिए कादर खान को 1500 रूपये मिलेजो उस ज़माने के हिसाब से बड़ी रकम थी क्योंकि बकौल कादर खान उसके पहले उन्होंने पांच सौ का नोट भी नहीं देखा था। सात हफ्ते के बाद कादर खान अपनी संस्था में वापस जाने को तैयार थे कि तभी किसी ने आकर कादर खान से कहा “मैं एक प्रोड्यूसर हूँ और एक फिल्म बनाने के बारे में सोच रहा हूँ। फिल्म का नाम है ‘खेल-खेल में। ये रहा स्क्रीनप्ले (Screenplay) और मैं चाहता हूँ आप इसके डायलॉग्स लिखें।” उसने कादर खान को एक खासा मोटा लिफाफा थमाया। जिसमें दस हज़ार से ज़्यादा रुपये थे। कादर खान ने स्क्रिप्ट पूरी की। उसके ठीक बाद कादर खान को एक और ऑफर मिला।
जब मनमोहन देसाई ने कहा एक और मुसलमान लेखक। मैं ऊब चुका हूँ उनसे
चार या छः महीने बाद कादर खान को मनमोहन देसाई ने बुलवाया। वे ‘रोटी’ फिल्म बना रहे थे। और उर्दू लेखकों से बुरी तरह परेशान हो चुके थे। तो प्रोड्यूसर ने कहा “कादर  खान को ट्राई क्यों नहीं करते?”  

इस पर मनमोहन देसाई ने कहा। "एक और मुसलमान, मैं ऊब चुका हूँ उनसे। ये राइटर तमाम मुहावरे लोकोक्तियों और उपमाओं का इस्तेमाल करते हैं मुझे अपनी रोजमर्रा की जबान चाहिए क्या वो लिख सकता है?    
हालाँकि इसके बाद वो कादर खान से मिले  मिले और बोले “देखो मियाँमैं बहुत स्ट्रेट बोलता हूँ। तुम्हारी स्टोरी पसंद आयेगी तुम्हारा डायलॉग अच्छा लगेगा तो ठीक है वरना धक्के मारकर बाहर निकाल दूंगा।” और हाँ “अगर अच्छा लगा तो मैं तेरे को लेके गणपति की तरह नाचूँगा भी। ”पिछले छः या आठ महीनों में किसी ने कादर खान ऐसे बात नहीं की थी।

उन्होंने कादर खान को पूरा क्लाइमैक्स नरेट किया। वे खेतवाड़ी में रहते थे। दो या तीन दिन बाद जब कादर खान वहाँ गए तो मनमोहन देसाई गली के लड़कों के साथ क्रिकेट खेल रहे थे। उन्होंने कादर खान को देखा और बोले “क्या है?”

कादर खान ने जवाब दिया “सब्जेक्ट और सीन सुनाने आया हूँ।”  “सुनाने मतलबलिख के लाया है ?” उन्होंने क्रिकेट खेलना छोड़ा और कादर खान बोले “चल झटपट। वे कादर खान को अन्दर ले गए। कादर खान ने सीन सुनाया तो वे उछल पड़े। “दुबारा! फिर से सुनाओ!” उन्होंने चिल्लाना शुरू किया “जीवन!” जीवन उनकी पत्नी का नाम था। “इधर आ!

कायको बुलाया है?”  उनकी पत्नी ने उन्होंने पूछा।

सुनो ये क्या लिख के लाया है। कादर खान ने फिर से सीन दोहराए। तो मनमोहन देसाई ने रोना शुरू कर दिया। तब उनकी पत्नी जीवन बोली “ये आदमी ऐसे सीन के लिए छः महीने से मर रहा है। तुमने उससे कहीं ज़्यादा कर दिखाया है।

वे बोले “फिर से!” कादर खान ने पूरा एपीसोड करीब दस बार सुनाया। कादर खान को पता नहीं था कि उन्होंने टेप पर सब कुछ रिकॉर्ड कर लिया था। फिर मनमोहन देसाई अपने घर के अन्दर के कमरे में गए और एक छोटा पैनासोनिक टीवी लेकर आये। बोले “ये तुमको मेरी ओर से तोहफा है।” फिर उन्होंने कादर खान को सोने का एक कड़ा और पच्चीस हज़ार रुपये भी दिए। और बोले “कादर खान ये मेरी तरफ से एक यादगार।

उसके बाद एक दिन मनमोहन देसाई ने  इंडस्ट्री के तमाम लेखकों और निर्देशकों को फोन लगाया और बोले “अब तुम सब चेत जाओ। एक आदमी आ गया है जो तुम्हारी इंडस्ट्री पर राज करने जा रहा है।” वे थोड़ा सनकी भी थे। उन्होंने लेखकों से कहा “अपनी कलमें फेंक दो। तुम्हें लिखना नहीं आता।” कादर खान से बोले “लिखने के लिए तुम्हें कितना मिलता है?”

कादर खान  ने कहा “पच्चीस हज़ार। 
वे बोले “अब तुम्हारा रेट एक लाख होगा।” इस तरह कादर खान एक लाख पाने वाले लेखक बन गए। इस तरह कादर खान पहली मंजिल से सौवीं मंजिल पर पहुंच गए। सौवें माले से जब कादर खान उड़ान भरी। तो, वहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था। बगैर कादर खान मनमोहन देसाई कोई फिल्म बना ही नहीं पाते थे। कादर खान को वे स्क्रीनप्ले पर बहसोंकहानी और गीतों तक हर चीज़ में अपने साथ बिठाते थे।

ऐसे खुलें दक्षिण के द्वार

एक दिन कादर खान आर। के। स्टूडियो में शूट कर रहे थें  जितेन्द्र उनके पास आये और बोले “माफ़ करना लेकिन एक प्रोड्यूसर आपसे दो सालों से मिलना चाह रहा हैलेकिन उसके पास आपसे मिलने की हिम्मत नहीं है।तब कादर खान के बुलाने पर वह प्रोड्यूसर आया। कादर खान ने उसे पूछा “आपको यह गुमान कब से हुआ कि मैं एक बड़ा लेखक और आदमी हूँमैं एक साधारण इंसान हूँ।

नहीं सरदरअसल मेरा भाई आपसे बात करना चाहता है।सो कादर खान उसके भाई हनुमंत राव से बात की जो पद्मालय का प्रोड्यूसर था। उसने कहा “मैं कन्नड़ से हिन्दी में एक रीमेक बनाने की सोच रहा हूँ।” उसने कादर खान स्क्रिप्ट थमाई।


कादर खान ने स्क्रिप्ट सुनी” उसके बाद बोले “दक्षिण भारत में आप जब रीमेक बनाते हैं तो आप शब्द दर शब्द ओरिजिनल की कॉपी करते हैं। मैं वैसा नहीं कर सकता। मुझे इसे दुबारा लिखना होगा। इसपर हनुमंत राव ने कहा “आपको जैसा करना हो कीजिये। कादर खान ने वैसा ही किया ‘उस फिल्म का नाम था मेरी आवाज़ सुनो। फिल्म सुपरहिट गयी। कादर खान बेस्ट राइटर (Best Writer) का इनाम मिला। इस तरह साउथ में कादर खान की एंट्री हुई।

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