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नई ई- कॉमर्स पॉलिसी- कहीं लेने के देने न पड़ जाएं !

डब्ल्यूटीओ के दबाव में भारत सरकार को भी अन्य देशों की तरह अपनी ई- कॉमर्स पॉलिसी लानी पड़ी है। हालाँकि भारत के खुदरा व्यापारियों के हितों के लिए नियम बनाने का वादा तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 लोकसभा चुनाव से पहले भी किया था। मगर जीत के बाद वो वादा भी अन्य चुनावी वादों की तरह ठंडे बस्ते में चला गया। जानकारी के अनुसार नई ई- कॉमर्स पॉलिसी 1 फ़रवरी 2019 से लागू की जाएंगी।

वहीं फ़िलहाल जिस तरह का ड्राफ्ट भारत सरकार के द्वारा खुदरा व्यापारियों के हितों की रक्षा के लिए लाया जा रहा है वह कितना फायदेमंद होगा ये देखने वाली बात होगी। क्योंकि- इस ड्राफ्ट के नए नियमों के मुताबिक कोई भी  विदेशी निवेश वाली  (E-Commerce Policy) ई- कॉमर्स कंपनी उन प्रोडक्ट्स पर डिस्काउंट ऑफर नहीं ला पाएंगी जिनमें उनकी खुद की हिस्सेदारी या प्रबंधकीय हस्तक्षेप है। जैसे कि अमेज़न की अपनी डिलीवरी पार्टनर Cloud tail India में है। 



दरअसल केंद्र सरकार ने विदेशी निवेश वाली E-Commerce Companies के काम करने के नियमों पर नकेल तो साल 2018 के अंत से ही शुरू कर दी थी जब उन्हें इस बात के लिए निर्देश दिए  गए थे कि अब वो इन्वेंटरी पर अपना स्वामित्व या नियंत्रण कायम नहीं रख सकती हैं एवं उन्हें वेयरहाउस लॉजिस्टिक एवं विज्ञापन जैसी सेवाएं भी बिना किसी भेदभाव के सभी विक्रेताओं को उपलब्ध करवानी होंगी

आपको बता दें कि #Amazon की अनुषांगी कंपनी क्लाउडटेल में तक़रीबन 51.50 प्रतिशत की हिस्सेदारी है। वहीँ अगर बात क्लाउडटेल के वर्ष 2016-17 के व्यवसायिक नतीजों की करें तो उस वर्ष कंपनी ने तक़रीबन 7149 करोड़ का लाभ अर्जित किया था। इसके अलावा भी बहुतेरी भारतीय ई- कॉमर्स कंपनियां अपने बनाए प्रोडक्ट्स को अब खुद की बनाई ऑनलाइन सर्विस के ज़रिये भी लोगों तक पहुंचा रहीं हैं। एक तरह से कहें तो हर छोटा-बड़ी व्यापारिक इकाई अब ऑनलाइन मार्किट Online Market  में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा रही हैं। वहीं अपने व्यापार को विस्तार देने के लिए ये कंपनियां कई अन्य कंपनियों की साझेदारी खरीदकर विभिन्न उत्पाद्कर्ताओं को भी उनका माल देशभर में बेचने का प्लेटफार्म उपलब्ध कर रहीं है। जिससे कि ज़्यादातर व्यापारियों को लाभ ही हुआ है। 



अगर बात अमेज़न की हीं अपनी हिस्सेदारी वाली कंपनियों की करें तो उसमें कुछ जाने-माने नाम  Amazonbasics, Solimo, Symbol, Myx, Vedaka, Presto Amazonbasics, Solimo, Symbol, Myx, Vedaka, Presto और Kindle शामिल हैं। इसके अलावा अमेज़न की फ़ूड प्रोडक्ट्स की ईकाई अमेज़न की खुदरा व्यापार यूनिट भी अपने उत्पाद ऑनलाइन बाज़ार में बेचना बंद कर देगी  

ऐसे में सरकार अपने इस नए नियमों से खुदरा व्यापारियों का कितना संरक्षण कर पाएगी ये तो अभी देखना होगा। मगर वहीँ अगर बात इन नए नियमों से होने वाले नुकसान की करें तो वो स्पष्ठ समझ आ रहें है।

1    घट सकता है विदेशी निवेश- अमेरिका और जापान एवं चीन जैसे निवेशक देशों के लिए भारत हमेशा से एक बड़ा उपभोक्ता बाज़ार रहा है। सरकार के इस नए नियम से #FDI विदेशी निवेशकों का उत्साह कम हो सकता है जिससे वे अपना निवेश घटा सकते हैं। इसका सीधा असर भारतीय अर्थवयवस्था के उस प्रयास को भी लगेगा जिसके द्वारा प्रधानमंत्री स्वयं विदेशी निवेशकों को भारत में निवेश के लिए आकर्षित करने प्रयास करते रहते हैं।



   नौकरियों पर गिर सकती है गाज- भारत में E-Commerce Industry नौकरियों का एक बड़ा स्रोत बन चुकी हैं। मगर नए नियमों के बाद अपने संभावित घटते मुनाफ़े के कारण इंडस्ट्री बड़े पैमाने पर नौकरियों में छटनी कर सकती हैं। सरकार द्वारा लिए गए जीएसटी एवं नोटबंदी के निर्णय से पहले ही देश में नौकरियों का बुरा हाल है ये बात किसी से छिपी नहीं है। Center for Monitoring Indian Economy (CMIE) की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2018 में ही 1.10 करोड़ भारतियों को अपनी नौकरियां गवानी पड़ी हैं।   


3    उपभोक्ता भी नाराज़ हो सकता है- धीरे-धीरे देश का एक बड़ा उपभोगता वर्ग अब ऑनलाइन शॉपिंग को अपना चुका है। इसका बड़ा कारण ऑनलाइन शॉपिंग पर आये दिन मिलने वाले cash back offers के अलावा Great Indian Sale है जो उन्हें कभी भी खुदरा बाज़ार में नहीं मिलती।

आपको बता दें कि नई ई कॉमर्स पॉलिसी से अमेज़न के अलावा भारत में व्यापार करने वाले कई और बड़े ब्रांड्स में बिग बास्केट, ग्रोफर्स फ्लिपकार्ट शामिल हैं। जो आये दिन अपने ग्राहकों के लिए भारी-भरकम डिस्काउंट वाले ऑफर्स लाती रहती हैं। वहीं यहाँ से खरीदारी करने पर ग्राहकों को कई स्कीमों के तहत काश बैक ऑफर्स भी मिल जाते हैं।


अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में जा सकता है गलत संदेश- इज़ ऑफ डूइंग बिज़नस का ढोल पीटने वाली सरकार के इस तरह के जटिल निर्णय से अन्तरराष्ट्रीय व्यापार मंच के साथ भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है। क्योंकि- एक तरफ तो सरकार व्यापारियों को इज़ ऑफ डूइंग बिज़नस (Ease of doing Business) का नारा देकर लोगों को निवेश के लिए आमंत्रित करना चाहती है वहीँ उसके नियम व्यापार करने के लिए अनुकूल नहीं दिख रहें। एक जानकारी के मुताबिक Flipkart एवं amazon के पास तक़रीबन 5 हज़ार करोड़ का माल पड़ा है जिसे उन्हें 1 फ़रवरी से पहले निपटाना होगा। ऐसे में उनको होने वाले घाटे से न सिर्फ उनकी नाराज़गी बढ़ेगी बल्कि अन्य विदेशी निवेशक भी भारत में निवेश से कतराएंगे।


युवाओं में दोहरी नाराज़गी- जैसा कि अनुमानित है कि सरकार के नियम बदलने से होने वाले नुकसान की भरपाई इस क्षेत्र से जुड़ी कंपनियां देश के युवाओं की नौकरियां घटाकर सकती है। वहीं युवाओं की नाराज़गी का दूसरा बड़ा कारण उन्हें मिलने वाले Discount Offers के न मिलने से उपज सकता है।   



6    चपेट में आएँगे और भी कई व्यापार- ई- कॉमर्स का मतलब सिर्फ खरीद एवं बिक्री का नया ठिकाना हीं नहीं है। यहाँ सरकार को अपनी दूरदृष्टि का सहारा लेते हुए ये भी देखना चाहिए था कि हर ऑनलाइन प्लेटफार्म से कई और तरह के व्यापार भी जुड़ें हुए हैं। जिनमें Product Manufacturer के अलावा  Logistics Industry, Customer care एवं Call Centers Industry की भी अच्छी खासी हिस्सेदारी है जो की इस निर्णय से प्रभावित होगी।  


   
   वोट मिलने की कोई गारंटी नहीं- सरकार ने चुनावी मौसम में भले ही ये फैसला छोटे एवं मझोले खुदरा व्यापारियों को रिझाने के लिए लिया हो मगर इसकी कोई गारंटी नहीं कि इससे व्यापारी वर्ग का वोट उसे ही मिलेगा, क्योंकि- भारत का व्यापारी ऑनलाइन शॉपिंग से पिछले सालों में इतना नाराज़ नहीं रहा जितना की वो GST  एवं नोटबंदी Demonetization के अचानक लागू करने से प्रभावित हुआ। ऐसे में ये कहना कि मात्र एक ई- कॉमर्स पॉलिसी के आ जाने से व्यापारी वर्ग खुश होकर अपने वोट मौजूदा सरकार को दे देगा कहना सही नहीं होगा।



विदेशी चुनावी चंदा भी घट सकता है- क्या आपने कभी सोचा है कि विदेशी कंपनियां भारतीय राजनीतिक दलों को चुनावी Electoral Bond चंदा क्यों देती है? सीधी सी बात है कि हर व्यापारिक कंपनी अपने हिसाब से राजनीतिक दलों को चंदा इसलिए देती हैं ताकि वो उन्हें उनके व्यापार विस्तार में सहायता करें। लेकिन जब सरकार की कोई नई व्यापारिक नीति किसी विशेष प्रकार के व्यापार को टारगेट कर बनाई जाएगी तो उस व्यापारिक वर्ग का नाराज़ होना स्वाभाविक है। ऐसे में क्या वो खुले मन से चुनावी चंदा दें पाएंगे?

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