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...इसलिए भारत ही नहीं वैश्विक अर्थव्यवस्था पर छा रहें हैं मंदी के बादल !


भारतीय अर्थव्यवस्था की चाल पिछले कुछ महीनों से स्पष्ट रूप से आने वाली मंदी के संकेत दे रही है। हालांकि अर्थव्यवस्था के जानकारों को ये दबाव एक के बाद एक किये गए नोटबंदी और जीएसटी के प्रयोग के तुरंत बाद से ही समझ आने लगा था। मगर केंद्र सरकार के अड़ियल रवैये के कारण इसका कोई ठोस हल नहीं निकल पाया। मेरे अपने शहर जमशेदपुर जहां एशिया की सबसे विशाल (Adityapur Industrial Area Development Authority - AIADA Jharkhand India). में स्थित 1100 छोटी-बड़ी फैक्टरियां इस मंदी की शुरूआती भेंट चढ़ चुकी हैं 

कारण टाटा मोटर्स का अपना उत्पाद घटाया जाना। जिनके लिए ये सभी फैक्टरियां विभिन्न प्रकार के ऑटो पार्ट्स बनाती थी। आप खुद अंदाज़ा लगा सकते हैं कि कितने लोग बेरोज़गार हुए होंगे कितने परिवारों की रोज़ी-रोटी का संकट आन खड़ा हुआ होगा। मगर दुर्भाग्य से ये संकट शायद जल्द न टल पाए क्योंकि डगमगाती भारतीय अर्थव्यवस्था के बाद अब जर्मनी और चीन जैसी बड़ी आर्थिक शक्तियों ने भी बुरे संकेत देने शुरू कर दिए हैं पूरी ख़बर नीचे पढ़ें...          


जीएसटी और नोटबंदी के प्रयोग से चरमराई भारतीय अर्थव्यवस्था एवं भारतीय बाज़ार में तेज़ी से ख़राब हो रही ऑटोमोबाइल सेक्टर की सेहत ने आने वाली मंदी के संकेत दे दिए हैं। टाटा मोटर्स, मारुती, अशोक लीलैंड, महिंद्रा सहित अनेकों बड़ी कंपनियों से आ रही नकारात्मक ख़बरों द्वारा  इस संकेत को स्पष्ट समझा जा सकता है। इसके अलावा बैंकिंग सेक्टर का वित्तीय संकट एनबीएफसी क्षेत्र की नामी कंपनी आईएलएंडएफएस, दीवान हाउसिंग के घोटालें, नकदी का संकट बढ़ती बेरोज़गारी दर एवं ताज़ा बजट में लगाए गए सुपर रिच टैक्स ने इंडियन इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन की न सिर्फ लागत में बढ़ोतरी की है बल्कि बिक्री की रफ़्तार को भी सुस्त कर दिया है। 

फाड़ा यानी (Federation of Automobile Dealers Associations) के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक ऑटोमोबाइल सेक्टर में जहाँ तक़रीबन 2 लाख नौकरियां ख़त्म हो चुकी हैं वहीं और 10 लाख नौकरियों के जाने के संकेत हैं। फाड़ा यानी (फेडरेशन ऑफ़ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन) के अनुसार देश में तक़रीबन 15000 कार डीलर्स हैं जिनमें से पूरे देश में तक़रीबन 286 शोरूम्स बंद हो चुके हैं। इन शोरूम्स द्वारा देशभर में प्रत्यक्ष रूप से 25 लाख एवं अप्रत्यक्ष रूप से 25 लाख लोगों को नौकरियां दी गई थी। आपको बता दें कि भारतीय जीडीपी (Indian GDP) में भारतीय ऑटोमोबाइल सेक्टर का लगभग 10 प्रतिशत का योगदान है।



उसके बाद अब टीवी की बिक्री में भी बड़ी गिरावट दर्ज की गई है। भारतीय टीवी निर्माता कंपनियों ने भी सरकार से जीएसटी की दर में कटौती एवं ओपन टीवी सेल पैनेल से इंपोर्ट ड्यूटी हटाने की मांग कर दी है। बता दें कि बढ़ती लागत ने टीवी की बिक्री को काफ़ी कम कर दिया है। इसके आलावा बाकी होम एप्लाईन्सेज़ जैसे की वाशिंग मशीन रेफ्रिजेटर की बिकी में गिरावट दर्ज की गई है। इसके अलावा अगर बात रियल इस्टेट सेक्टर की करें तो वहां भी देश के कई शहरों में लाखों फ्लैट्स बनकर तैयार हैं जिनका कोई खरीदार नहीं मिला रहा।



भारतीय जीडीपी की दर भी पिछले 5 सालों की सबसे निचली स्तर पर पहुँच गई है। वित्त वर्ष 2018-19 की चौथी तिमाही की जीडीपी दर फिसलकर 5.8 प्रतिशत पर आ गई है। ताज़ा जारी सरकारी आंकड़ों के अनुसार इस साल जीडीपी की दर 6.8 फीसदी की रहेगी जबकि साल 2019-20 में इसके 6.6 प्रतिशत रहने के अनुमान हैं।

सुस्त पड़ रही है ड्रैगन की रफ़्तार भी

मंदी के बादलों का अब चीनी अर्थव्यस्था पर भी विपरीत असर होता दिखने लगे है। चीन का इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन रेट 17 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। चीनी प्रॉपटी में भी निवेश की ग्रोथ रेट दिसंबर 2018 के बाद  से लगातार सुस्त है।

चीन के नेशनल ब्यूरो ऑफ स्टेटिस्ट‍िक्स के आंकड़ों की माने, तो  जुलाई महीने में इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन में सिर्फ 4.8 फीसदी की मामूली बढ़त हुई थी। इसके पहले जून के महीने में इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन में 6.3 प्रतिशत की बढ़त हुई थी। विदित है कि साल 2018 से चीन और अमेरिका के बीच ट्रेड वॉर जारी है, अमेरिका ने कई चीनी सामानों पर भारी टैरिफ थोप दिए थे। पिछले दिनों मई महीने में अमेरिका ने एक बार फिर से चीनी आयात पर टैरिफ बढ़ा दिया है।

इन आंकड़ों के अलावा चीन में घरेलू मांग भी तेज़ी से घट रही है। न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन में कमी, निर्यात में नरमी और बैंक लोन के आंकड़ों में आई कमी ने चीनी सरकार को इस बात के लिए मजबूर किया है कि अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए सरकार जल्द से जल्द कोई राहत पैकेज दें।



ख़बरों के मुताबिक साल 2019 की दूसरी तिमाही में चीनी अर्थव्यवस्था की बढ़त 30 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई है। दरअसल चीन में पिछले कुछ वक़्त से खुदरा बिक्री की दर भी निराशाजनक रही है। चीन में जुलाई का स्टील उत्पादन कम रहा है और खुदरा बिक्री में मात्र 7.6 फीसदी की बढ़त हुई है, जबकि जून में इसमें 9.8 फीसदी की बढ़त हुई थी। इस साल जनवरी से जुलाई के बीच चीन के फिक्स्ड एसेट इनवेस्टमेंट में 5.7 फीसदी की बढ़त हुई थी जो कि पिछली बढ़त की तुलना में नगण्य है। 

चीन का प्रॉपर्टी बाज़ार दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन में योगदान देने वाला प्रमुख क्षेत्र है। इस क्षेत्र के निवेश में आया स्लो डाउन भी अर्थव्यवस्था के लिए चिंता की बात है,। आंकड़ों के मुताबिक जुलाई महीने में चीनी प्रॉपर्टी निवेश में 8.5 फीसदी की मामूली बढ़त हुई थी, जबकि जून में इसमें 10.1 फीसदी की बढ़त हुई थी। इसके पहले दिसंबर, 2018 में निवेश की दर 8.2 फीसदी थी।

चीन और अमेरिका के बीच टकराव का सिलसिला पिछले साल जुलाई जुलाई से लगातार जारी है जब अमेरिका ने पहली बार चीनी सामानों पर 10 प्रतिशत के नए टैरिफ लगाए थे। इसके बाद इस साल मई के महीने में इसे बढ़ाकर 25 प्रतिशत कर दिया गया। बताते चले कि चीन से अमेरिका द्वारा आयात होने वाले सामानों की कीमत अरबों डॉलर में होती है। ऐसे में भारी टैरिफ की वजह से आयत प्रभावित हो रहा है और चीन का अमेरिका के साथ व्यापार तेज़ी से घट रहा है

इससे बौखलाए चीन ने भी जवाब में 110 अरब डालर के अमेरिकी सामान के आयात पर नया टैरिफ लगा दिया था। गौरतलब है कि अमेरिका चीन का सबसे बड़ा बिज़नेस पार्टनर है। वर्ष 2017 में चीन के साथ अमेरिका का कुल व्यापार 635.4 अरब अमेरिकी डॉलर का था। जबकि इसमें अमेरिका से निर्यात मात्र 129.9 अरब डॉलर और चीन से किया गया आयात 505.5 अरब डॉलर का था।

मंदी के मुहाने पर पहुंची जर्मनी की अर्थव्यवस्था भी !

साल 2019 की दूसरी तिमाही में भी नकारात्मक निर्यात दर का सामान कर रही जर्मनी की अर्थव्यवस्था ने भी हिचकोले खाना शुरू कर दिया है। जानकारों के अनुसार इसके जल्द सुधार के आसार भी कम हैं क्योंकि (Brexit) ब्रेक्जिट यानी (यूनाइटेड किंगडम के यूरोपीय संघ से बहार निकलने का निर्णय) और टैरिफ के विवादों के चलते मैनुफैक्चरिंग सेक्टर काफी प्रभावित हुआ है।


साल की पहली तिमाही से दूसरी तिमाही में तुलनात्मक रूप से कुल उत्पादन में 0.1 प्रतिशत की गिरावट पायी गयी है। इसके कारण सरकार पर बेलआउट पैकेज देने का दबाव बढ़ता दिख रहा है हालाँकि अब तक सरकार द्वारा किसी भी तरह के राजस्व प्रोत्साहन देने की कोई घोषणा नहीं की गई है। जर्मन अर्थव्यवस्था के जानकारों के अनुसार अगर अब ऐसा नहीं किया गया तो देश की अर्थव्यवस्था को मंदी से बचाया नहीं जा पाएगा।

जुलाई में आई चीन की इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन की दर जो 17 सालों में सबसे धीमी दर्ज की गई है। इसका असर भी (Global Market) ग्लोबल मार्किट पर पड़ रहा है। इस कारण यूरोजोन (यूरोपियन देश) भी इस मंदी से प्रभावित हैं जहां की इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन की दर दूसरी तिमाही के दौरान घटकर केवल 0.2 फीसदी रह गई। बता दें कि यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जर्मनी पारंपरिक रूप से निर्यात पर निर्भर होती है। यही कारण है कि जर्मनी पर इसका सबसे ज्यादा असर दिख रहा है। लंबे वक़्त से घरेलू बाज़ार की जिस मांग का जर्मनी को सबसे ज़्यादा फायदा मिल रहा था उसमें भी गिरावट दर्ज की जा रही है।



मार्केट रिसर्च फर्म आईएनजी के विश्लेषक कार्सटेन ब्रजेस्की के अनुसार, “जीडीपी की ताज़ा रिपोर्ट ने एक तरह से जर्मन अर्थव्यवस्था के सुनहरे दशक का अंत कर दिया है।" उन्होंने बताया कि "व्यापारिक संकट, वैश्विक अनिश्चितताएं और संघर्ष करते ऑटोमोटिव सेक्टर ने अंतत: अर्थव्यवस्था को घुटनों पर ला दिया है।

फेडरल स्टैटिस्टिक्स ऑफिस की रिपोर्ट के अनुसार पहली तिमाही के आंकड़ों के हिसाब से सालाना वृद्धि दर 0.9 प्रतिशत से घटकर 0.4 पर आ गई। साल 2019 के अंत तक इसके 0.5 फीसदी तक पहुँचने के आसार हैं जबकि साल 2018 में यह संख्या 1.5 फीसदी थी। जर्मनी के वित्तमंत्री पेटर आल्टमायर ने भी इस तरह के वित्तीय स्थिति को कमज़ोर करार दिया है वहीं 31 अक्टूबर को ब्रिटेन के ईयू से बाहर निकलने (Brexit) के बाद एक और झटका लगने की बात को स्वीकार भी किया है।

जबकि देश के इंडस्ट्रियल सेक्टर की मांग है कि सरकार अपनी संतुलित बजट की पारंपरिक नीति में बदलाव कर नए ऋण बांटकर सार्वजनिक निवेश को बढ़ावा दे। लेकिन जर्मन सरकार ने इसकी कोई ज़रूरत नहीं बताई है। हालांकि कंस्ट्रक्शन सेक्टर में भी कमी देखने को मिली है लेकिन घरेलू मांग अभी भी सकारात्मक है। इसलिए सरकार का कहना है कि बीते सालों में इससे देश की अर्थव्यवस्था में काफी योगदान दिया है विशेषकर देश की रोजगार की दर को बनाए रखने में। साथ ही वेतन में मुद्रास्फीती को पाटने वाली बढ़ोत्तरी और सस्ते कर्ज के कारण उपभोक्ताओं का भरोसा बना रहा है।

हालांकि वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि प्रोत्साहन देने के नाम पर जर्मनी में मौद्रिक नीति में थोड़ी बदलाव करने की मांग आने वाले समय में राष्ट्रीय बहस का मुद्दा बन सकती है। सन 2008 की वैश्विक आर्थिक मंदी के समय से ही जर्मन सरकार के आर्थिक प्रबंधन को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचना हुई थी।

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