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राखोश- भारत की पहली पीओवी तकनीक आधारित साइकोलॉजिकल थ्रिलर!

तकनीक के इस्तेमाल के मामले में वैसे तो भारतीय सिनेमा हॉलीवुड से अभी बहुत पीछे माना जाता है। लेकिन अब शायद वो दौर शुरू हो गया है जब भारतीय फ़िल्म निर्माता/निर्देशकों ने फ़िल्म निर्माण में कहानी और संगीत के अलावा इससे जुड़े अन्य पहलुओं पर भी गंभीरता से विचार करना शुरू कर दिया है।

शायद ये इसी का नतीजा है कि देश में पहली बार और विश्व सिनेमा के इतिहास में दूसरी बार पीओवी तकनीक का इस्तेमाल कर एक फ़िल्म का सफ़लतापूर्वक निर्माण किया गया है।



क्या है ये पीओवी तकनीक?

पीओवी का मतलब होता है (पॉइंट ऑफ़ व्यू- नज़रिया)। आपने अक्सर फ़िल्मों में किसी ख़ास किरदार के नज़रिए को लेकर फरमाए गए कुछ ख़ास सीन्स या डायलॉग देखे होंगे। लेकिन यदि एक पूरी की पूरी फ़िल्म ही किसी ख़ास क़िरदार के नज़रिए से बना दी जाए, तो क्या कहने!

दरअसल यहाँ सिर्फ़ ये बात ख़ास नहीं है कि एक किरदार विशेष को पूरी कहानी में तवज्जों दी गई है। बल्कि इस फ़िल्म की ख़ासियत ये है कि फ़िल्म का मुख्य कलाकार कोई और नहीं बल्कि फ़िल्म का कैमरा है। जो फ़िल्म के मुख्य किरदार का रोल निभाता है जिसके इर्द-गिर्द फ़िल्म की कहानी घूमती है।

दर्शक इस मुख्य किरदार को देख तो नहीं पाते मगर महसूस ज़रूर कर सकते हैं। फ़िल्म की यही अनोखी तकनीक अंत तक दर्शकों को उस ख़ास किरदार से जोड़े रखती है दर्शकों का झुकाव बड़ी ही सफलता से अपनी ओर बनाए रखती है।



फ़िल्म की कहानी साठ के दशक के मराठी लेखक नारायण गोपाल धड़प जिन्होंने मराठी साहित्य के लिए ढेरों हॉरर कहानियां लिखी थी उनकी एक थ्रिलर कहानी पेशंट नंबर 302 से प्रेरित है। फ़िल्म एसडी मोशन पिक्चर के बैनर तले बनी है जिसके निर्माता संतोष देशपांडे एवं सयाली देशपांडे हैं। प्रशेन क्यावल ने क्रिएटिव प्रोडूसर की ज़िम्मेदारी संभाली है वहीं संजय मिश्रा, तनिष्ठा चटर्जी, प्रियंका बोस और बरुण चंदा मुख्य भूमिका में हैं नामित दास ने कैमरे के पीछे छिपे फ़िल्म के लीड करैक्टर बिरसा को अपनी आवाज़ दी है।

फिल्म का निर्देशन अभिजित कोकाटे एवं श्रीविनय सालियान ने किया है फ़िल्म की अनोखी कहानी को लिखा भी श्रीविनय सालियान ने है, जबकि सिनेमेटोग्राफी को बेसिल पाएरेट ने और एडिटिंग को दिनेश गोपाल पुजारी ने बखूबी संभाला है।

फ़िल्म की कहानी एक मानसिक रूप से विक्षप्त बंगाली युवा बिरसा की है जिसे उसकी मानसिक स्थित के कारण कई यातनाएं झेलनी पड़ती है। ख़ासकर उसके पिता और बड़े भाई द्वारा उसपर किये जाने वाले ज़ुल्म। वहीं उसकी बड़ी बहन शोमा “तनिष्ठा चटर्जी” को हमेशा बिरसा के पक्ष में दिखाया गया जो उसकी भावनाओं को समझ पाती है। ये फ़िल्म की कहानी का एक हिस्सा है।



फ़िल्म की कहानी का दूसरा हिस्सा बिरसा के मेंटल असाइलम में बिताए खौफ़नाक अनुभव से जुड़ा है। जहाँ उसे एवं उसके एक वृद्ध पागल साथी कुमार जॉन (संजय मिश्रा) को असाइलम में मानसिक रोगियों की हत्या करने वाले एक कथित हत्यारे राखोश (बांग्ला भाषा में राक्षस) के बारे में पता चलता है जो अक्सर किसी पागल की बड़ी ही बेरहमी से हत्या कर देता है।

बिरसा और उसका वृद्ध दोस्त, राखोश और उससे जुड़े रहस्यों का पता लगाने की कोशिश करते हैं। जिसमें बाद में वृद्ध पागल कुमार जॉन की बेटी रिद्धिमा “प्रियंका बोस” भी शामिल हो जाती है।



कहानी के अंत में जिस ख़तरनाक मंसूबे का ख़ुलासा होता है वो दर्शकों को विक्षप्त लोगों के जीवन के बारे में सोचने के लिए मजबूर कर देगा। ये फ़िल्म हमें बतौर एक इंसान ये सोचने पर मजबूर कर देगी कि अपने आस –पास के मानसिक रोगियों से त्रस्त आकर हम उन्हें जिन मेंटल असाइलम में ठीक होने के लिए भेज देते हैं क्या वो उनके लिए कितने सुरक्षित हैं?

क्या कभी किसी ने इस बात का का पता लगाने की कोशिश की है कि वहाँ उनके साथ किस प्रकार का बर्ताव किया जाता है?

फ़िल्म की विशेषताएं-

फ़िल्म की सबसे बड़ी विशेषता इसकी भारतीय दर्शकों को एक नई तकनीक से रूबरू करवाना है। साथ ही अगर आपकी दिलचस्पी आर्ट फिल्म्स को देखने में है तो ये फ़िल्म आपको ज़रूर पसंद आएगी। बात अगर कलाकारों की कि जाएं तो संजय मिश्रा को जितना समय दिया गया है उसमें उनकी पूरी मेहनत नज़र आती है।

हालाँकि उनके रोल को थोड़ा और समय मिलना चाहिए था। बाकी कलाकारों ने भी अपनी भूमिका के साथ पूरा न्याय किया है।



कमियाँ
एक सनसनीखेज़ फ़िल्म बनाने के लिए फ़िल्म में जितना थ्रिलिंग मटेरियल चाहिए उसकी कमी कहीं न कहीं नज़र आती है। निर्देशक कुछ और रहस्मयी/सनसनीखेज़ सीन्स के द्वारा फ़िल्म के स्वाद में इज़ाफा कर सकते थे।

फ़िल्म की कहानी जिस कथित हत्यारे राखोश को लेकर शुरू होती है जिसने दर्शकों को अंत तक फ़िल्म देखने के लिए प्रेरित किया। वो अचानक ही कहानी से गायब हो जाता है और फ़िल्म समाप्त होने तक दर्शकों को इस बात का कोई पता नहीं चल पाता कि आखिर कथित हत्यारा राखोश था कौन और किस मकसद से मेंटल असाइलम के रोगियों का क़त्ल कर रहा था?

अगर आप पारंपरिक मनोरंजक सिनेमा से हटकर कुछ अलग तलाशने वाले दर्शक हैं तो इसे ज़रूर देखें! फ़िल्म नेट फ्लिक्स पर रिलीज की गई है फ़िल्म को राजस्थान फ़िल्म फ़ेस्टिवल में बेस्ट ज्यूरी अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है।

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