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रिर्पोटर- बताए आपको कैसा महसूस हो रहा है?

हालांकि ऐसी शर्मसार कर देने वाली मीडिया रिर्पोटिंग की घटना न पहली बार हुई है न ही अकेले ऐसी घटनाएं सिर्फ भारत में हुई है। हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान से लेकर दुनिया में अपनी बादशाहत कायम कर चुके अमेरिका एवं ब्रिटेन में भी इस प्रकार की बचकाना हरकतों वाली तीसरे दर्जे की रिर्पोटिंग कई बार कई पत्रकारों द्वारा की गई है। वही उनके मीडिया संस्थानों द्वारा बिना अपने विवेक के इस्तेमाल के बड़ी ही जल्दबाजी में इस प्रकार की खबरें प्रकाशित-प्रसारित भी की गई है। मगर इन सब के बीच सीधा एवं साधारण सवाल जो हर बार पीछे छूट जाता है, वो ये है कि कब हमारा मीडिया ऐसे मामलों की संवेदनशीलता को समझते हुए रिर्पोटिंग करना सीखेगा?
मीडिया पर हावी ‘सबसे पहले सबसे तेज खबरें‘ दर्शेकों तक पहुंचाने की होड में होने वाली भयंकर गलतियों ने एक तरफ जहां इसकी विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगाया है वहीं कई मीडिया संस्थानों की कार्यशैली एवं उनकी ग्राउंड रिर्पोटिंग को हंसी का पात्र बनने से नहीं छोड़ा। वहीं कई मामलों की रिर्पोटिंग तो शायद इसलिए भी आपत्तिजनक मानी गई क्योंकि वो देश की सुरक्षा के लिए खतरा एवं आपसी भाईचारे को बिगाड़ने वाली रह…

आपका भी कोई बाबा है क्या ?

15 सालों की लम्बी लड़ाई के बाद आज आखिर दोनों ही गुमनाम महिलाओं को न्याय मिल ही गया। बलात्कार के दोषी तथाकथित धर्मगुरू रामरहीम को न्यायलय ने सश्रम 10+10 कुल 20 सालों की सजा सुनाकर एक बार फिर आम भारतीय के भरोसे को जीत लिया है।आप इसमें से 10  राम का नाम बदनाम करने और 10  रहीम का नाम खराब करने की सजा भी मान सकते हैं।हालांकी भारतीय कानून के अनुसार रामरहीम के पास उच्च न्यायलय में अपील करने का विकल्प अभी उपलब्ध है। रैप से लेकर पॉप सांग गाने वाला ये बाबा कितना रंगीन मिजाज था ये बताने की जरूरत अब शायद नहीं बची है। मगर यहां सोचने वाली बात ये है कि कैसे ये बाबा लोग इतने मजबूत हो जाते है कि देखते ही देखते ये देश की कानून व्यवस्था के लिए संकट एवं मौजूदा राजनीति के लिए सिरदर्द बन जाते है। कौन पालता है इन्हें या फिर किसके फलने-फूलने में सहायक होते है ये लोग? क्या इसके पीछे सिर्फ राजनेताओं एवं राजनीतिक दलों का निहीत स्वार्थ छिपा होता है या फिर उससे कहीं ज्यादा आम लोगों की वो भौतिक एवं आत्मिक आकंक्षाए जिनके बारे में उन्हें लगता है कि वो सब ऐसे बाबाओं के द्वारा ही पूरी की जा सकती है। जिसमें खुशहाल वैभवश…

...... तो बैन हो जाएगा चीन का ये वेब ब्राउज़र

चीन की कम्पनी अलीबाबा का वेब ब्राउज़र यू सी ब्राउज़र जल्द ही भारत में बैन हो सकता है। दरअसल इस ब्राउज़र के चीनी वर्जन से डाटा लीक होने की खबर आने के बाद भारत सरकार ने इसकी जांच शुरू कर दी है। साल 2015 में यूनिवर्सिटी ऑफ़ टोरंटों की सिटिजन लैब में हुई जांच में ऐसी बात सामने आई थी कि यू सी ब्राउज़र के चीनी वर्जन से डाटा लीक होता है।

इसी बात को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार की संस्था सी-डेक हैदराबाद के द्वारा  यू सी ब्राउज़र की प्रारंभिक जांच शुरू कर दी गयी है।  ऐसे में यदि जांच लैब द्वारा इस बात की पुष्ठी कर दी जाती है की ये ब्राउज़र सुरक्षित नहीं है तो भारत सरकार जल्द ही इसपर बैन लगा सकती है।


गौरतलब है की काफी कम समय में चीन के इस वेब ब्राउज़र ने भारत में अपने पैर पसार लिए है।  ब्राउज़िंग के बाद इसका न्यूज़ एप यू सी न्यूज़ भी काफी प्रसिद्धि  प्राप्त कर चूका है। एक आकड़ें के अनुसार भारत के 50  प्रतिशत स्मार्ट मोबाइल फोन्स यूजर रोजाना इस वेब ब्राउज़र का इस्तेमाल करते है। वहीँ इसका यू सी न्यूज़ एप एक बढ़ते हुए न्यूज़एग्रीगेटर के रूप में काफी फल-फुल रहा है। ऐसे में यदि आप भी इस ब्राउज़र का उपयोग करते है त…

ऐसे बचाए अपने आधार कार्ड की जानकारी लीक होने से

आधारकार्ड की शुरुआत के दिनों में विपक्ष में रहते हुए भाजपा इसे असुरक्षित बताते हुए इस मुद्दे को लेकर जहां सुप्रीमकोर्ट कोर्ट तक चली गयी थी।वहीँ सत्ता में आने के बाद आज वही भाजपा आधारकार्ड को हर सरकारी योजना से जोड़ने में आतुर है एवं निहायती सुरक्षित भी बता रही है।

हमारी व्यक्तिगत जानकारी सुरक्षित है या नहीं इस बात पर सभी का अपना-अपना मत हो सकता है।आपको यहाँ ये बता दूँ कि चीन सरकार द्वारा चलाई गयी ऐसी ही एक योजना से एकत्रित डेटा आज वहां की सरकार की गलतियों के कारण वहां की कई कंपनियों तक पहुँच चूका है जिसकी खबर कुछ समय पूर्व मीडिया में आई थी। साथ ही हमारे यहाँ भी कई सरकारी पोर्टल्स से लाखों लोगों के आधार कार्ड की जानकारी लीक हो चुकी है। इसमें भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान रहे महेंद्र सिंह धोनी के आधार कार्ड के लीक होने की खबर मीडिया में खासी चर्चा में रही थी।वहीँ चाइना में लीक हुए डेटा में वहां के आम नागरिकों के साथ ही कई प्रतिष्ठित लोगों के डेटा में भी सेंधमारी हो चुकी है जिसमें अलीबाब के फाउंडर जेक मा भी शामिल है।

ऐसे में आधार कार्ड को अनिवार्य बना चुकी भारत सरकार क्या इसके दुरुप्रयोग से …

ऐसे करें खाद्य पदार्थ संबंधी कंपनियों की शिकायत

बात नामी-गिरामी रेस्टोरेंट की करें या फिर पैकेट बंद खाने के विभिन्न आइटम्स बेचने वाली देसी-विदेशी कंपनियों की! भारत में ऐसी ख़बरें अक्सर ही देखने-पढ़ने को मिल जाती है कि अमुक कम्पनी के खाद्य पदार्थ में मरा हुआ कॉक्रोच, कीड़े वगेरा मिलेमगर जानकारी के अभाव में एवं पश्चिमी देशों की तुलना में हमारें देश भारत में उपभोगता संरक्षण के कमज़ोर नियमों के कारण आम उपभोगता ऐसे मामलों में कुछ खास कार्यवाही कर ही नहीं पाता। हालाँकि ऐसा नहीं है कि भारत में उपभोगता के अधिकार को लेकर कोई उपयुक्त नियम नहीं है. मगर जानकारी और जागरूकता के अभाव में अक्सर ऐसे मामले घर के अन्दर ही रफा-दफा हो जाने है। 
जबकि पश्चिमी देशों में तो ऐसी घटनाओं से वहां की जनता एवं उपभोगता संरक्षण, उपभोगता अधिकारों के जानकार बड़ी कड़ाई के साथ निपटते हैवहीँ भारत में ज़्यादातर उपभोगता बहुत हुआ तो कंपनी के द्वारा फ़ूड पैक पर दी गयी ईमेल आई डी पर या तो ईमेल कर अपना गुस्सा निकल लेते है या फिर दौबारा उस कंपनी के सामान खरीदने से तौबा करके। 
आइये आपको बताते है भारत में ऐसे मामलों को लेकर आप कहां शिकायत कर सकते जहां से आपको सही मायनो में न्याय मिल सक…

वोडाफ़ोन की इस पहल को दिल से सलाम

पिछले कुछ सालों में डिजिटल मार्केटिंग के कारोबार में अप्रत्याशित वृद्धि देखने मिली है आज हर छोटा-बड़ा ब्रांड अपने विज्ञापन के लिए ऑनलाइन वेबसाइट को ज्यादा से ज्यादा तवज्जों देना चाहता है इसका प्रमुख कारण युवाओं का टीवी एवं अखबारों की तुलना ऑनलाइन न्यूज़ पढ़ने-देखने की ओर बढ़ते झुकाव को माना जाता है वहीँ धीरे-धीरे मोबाइल के ज़रिये बाकी लोग भी ऑनलाइन कंटेंट पढ़ने में ज्यादा रूचि लेनी शुरू कर दी है मगर ऑनलाइन न्यूज़ पोर्टल के नाम पर जारी गोरखधंधे और किसी एक कट्टर विचारधारा को समर्पित कई न्यूज़ वेबसाइटों ने न्यू मीडिया के शैशवकाल में ही इसे विवादों में डाल दिया है आज हर देश में फर्जी ख़बरों का बोल-बाला है भारत भी इससे बचा नहीं है जहां रोज़ाना सैकड़ों न्यूज़ वेबसाइट अपने पाठकों को तटस्थ ख़बरें पहुँचाने की बजाए धड़ल्ले से प्लांटेड, फेब्रिकेटेड ख़बरें परोस रही है ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार कंपनी वोडाफ़ोन ने अपनी विज्ञापन नीति में एक साहसी एवं बड़ा बदलाव करते हुए येल्लो जर्नलिज्म कर नफरत फ़ैलाने वाली कंपनियों को ऑनलाइन विज्ञापन न देने का नया नियम बनाया है द टाइम्स की ताज़ा खबर के मुताबिक वोडाफोन इसके …

मीडिया की मंडी

नब्बे के दशक में शुरू हुई उदारीकरण की नीति से भारतीय मीडिया भी अछूता नही रहा। इसी का परिणाम है कि मात्र दो दशकों में ही भारतीय मीडिया एक सफल एंव वृहत उधोग  का रूप ले चुका है। अब ये मात्र सामाजिक सरोकार की दृष्टि एंव नीति से कार्य नही करता।  बल्कि इसका भी उद्देश्य अब व्यक्तिगत लाभ तक केंद्रित होता जा रहा है। पिछले कुछ सालो में आयी निजी टी0 वी0 चैनलों एंव एफ0 एम0 रेडियों की अप्रत्याशित बाढ़ ने इस क्षेत्र में निजी लोगों एवं संस्थानों का वर्चस्व इस हद तक बढ़ा दिया है कि अब ये लोग इसका प्रयोग अपने निजी स्वार्थ साधने के लिए भरपूर करते है। जिसमें अधिक से अधिक लाभ कमाना इनका मुख्य उद्देश्य है। अनगिनत खबरिया एंव मनोंरजन चैनलों के अलावा लोगों की रूचि प्राईवेट एफ0एम0 चैनलों में भी दिखी है, जिसके फलस्वरूप मनोरंजन का साधन माना जाने वाला मीडिया अब एक गंभीर व्यापार का रूप लें चुका है।

भारतीय मीडिया आज जिस व्यवसायिक गति से आगे बढ़ रहा है उसमें सबकुछ बिकने लगा हैं।सूर्यग्रहण से लेकर चन्द्रग्रहण तक भूकंप से लेकर बाढ, तक आतंकवाद,क्रिकेट, सिनेमा,आत्महत्या करते किसान,तनावग्रस्त स्कूली बच्चें,बेरोजगार किशोरो …