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कहीं शर्मसार हुई पत्रकारिता तो कहीं निकले इसके आंसू

गिद्ध और मरणासन्न बच्ची की तस्वीर सालों पुरानी साल 1993 की है जब सूडान में अकाल पड़ा था। जोहान्सबर्ग दक्षिण अफ्रीका के जुनूनी फोटो जर्नलिस्ट केविन कार्टर अपने फोटोग्राफी के जूनून को आज़माने सूडान जा पहुचे थे। वहां उनके दिमाग में शायद सिर्फ दुर्लभ तस्वीरें खींचने का ही जूनून था इसलिए मरणासन्न बच्ची की तरफ बढ़ते गिद्ध को रोकने बजाए उन्होंने अपना सारा ध्यान तस्वीरें खींचने में ही लगा दिया। मगर परिणाम जब उनके सामने आया तो वो बर्दाश्त नहीं कर पाए , जब उन्होंने देखा की वो नरभक्षी परिंदा उस बच्ची के मांस नोच-नोच कर खा गया और वो अपने जूनून को पालते रहे, कुछ नहीं कर पाए। इस घटना के अपराधबोध से ग्रस्त केविन गहरे अवसाद में चले गए बाद में शायद पश्चाताप के लिए उन्होंने खुद्कुशी कर ली। इस तस्वीर को दुनिया भर में जहां फोटोग्राफी के जानकारों ने सराहा तो वही इसके मानवता को शर्मसार करते हिस्से के कारण इसकी भरपूर आलोचना भी हुई।

दूसरी घटना सीरिया के अल्लापो शहर के नजदीक की है जहां आतंकवादियों ने चिप्स देने के बहाने बच्चों को अपनी गाड़ी के पास बुलाया और फिर बम ब्लास्ट कर 126 लोंगो की जान ले ली। घटना में तक़री…

कब ख़त्म होगा अयोध्या का वनवास?

वैसे तो आस्था इतिहास एवं कानून की जटिलताओं में दीर्घकाल से जकड़ी अयोघ्या नगरी के लिए 30 सितंबर 2010 का दिन स्वतंत्रता दिवस के समान साबित हो सकता था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस संवेदनशील मुद्दे पर अपना फैसला सुनाकर वह रोशनी दिखाने का प्रयास किया था, जो सम्पूर्ण राष्ट्र को अतीत के अन्धेरे से बाहर निकाल सकती थी। मालूम हो कि भारत के इतिहास में अयोध्या का यह मामला पिछले500 – 600 वर्षो से धार्मिक विवादों में फंसा है एवं गत 67 वर्षो से न्यायालय में चल रहा है। देखा जाए तो यह समय अपने आप में राम के वनवास से भी काफी लम्बा है। साल 2010 से उच्चतम न्यायालय में लंबित पड़ा ये मामला एक बार फिर फ़रवरी 2016 में सुब्रमण्यम स्वामी के इस विवाद को लेकर काफी सक्रिय हो जाने के बाद  मीडिया की सुर्ख़ियों में आ गया था।
विदित है कि वर्ष 2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने भारतीयं जनता को अपने निर्णय के द्वारा विवादित जमीन का एक तिहाई हिस्सा निर्मोही अखाड़ा समिति को, एक तिहाई हिस्सा राम लल्ला विराजमान अर्थात भगवान राम की मूर्ति के लिए तथा एक तिहाई हिस्सा सुन्नी वक़्फ बोर्ड को देने का निर्णय किया था। न्यायालय के निर्णय…

ऐसी भी क्या जल्दी थी ?

8नवम्बरकीरात को प्रधानमन्त्री मोदीद्वारा500एवं1000के नोटबंदी के साहसिकघोषणासे एकओरजहां सभी राजनीतिक दलोंएवं कालाबाजारियों के बीचमें हडकंप मचगई,वहीँदूसरी ओरउनके इस निर्णय ने भारतीय अर्थव्यवस्था में अप्रत्याशित परिवर्तन आ गया है.कई जानकारप्रधानमन्त्री केइस निर्णय के दूरगामी परिणामों को देश केभविष्य केलिए एक सकारात्मक कदम बता रहे है. लेकिन इसकी क्या गारंटी है कि ऐसा होगा ही?जिस तरह आधी-अधूरी तैयारी से इस निर्णय को अचानक लागू किया गया वो आम जनता से लेकर व्यापारीवर्ग तकके लिए खासी परेशानी का सबब बनता नज़र आ रहा है.इस प्रकार के बड़े निर्णय को लेकरसरकारकीतैयारीकितनीनाकाफी थी,इसका अंदाजा हो रहे नुकसान कोदेखकर समझा जा सकता है.जनता अपने ही पैसों को निकालने, खर्च करने के लिए सरकारी आदेश के दायरों में बंधगई है.बच्चे, बूढ़ेएवं महिलाएं सभी बैंकों,एटीएम सेंटर के बाहर कतार में खड़े इस तुगलकी फरमान को झेलने के लिए विवश है.ऐसा नहीं है कि इससे पहलेकी सरकारों नेविमुद्रीकरण की नीति नहीं अपनाई गई थी मगर तब भी उस निर्णय में शुचिता कम और राजनीति ज्यादा थी! वो तब भी असफल रही और आज भी ऐसा ही मालूम पड़ता है.

व्यापार…