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जानिये कहां से ले सालाना एडमिशन या स्कूल फीस के लिए मदद-

लोग अभी तक बच्चों की उच्च शिक्षा या विदेश में होने वाली शिक्षा के खर्च का भार वहन करने में असमर्थ रहे हैं किंतु देश में प्राथमिक स्तर की प्राइवेट स्कूलों या इंग्लिश मीडियम के स्कूलों में बच्चों के दाखिले भी आज मीड़ियम क्लास के लोगों की नींव थर्रा जा रही है। बेहिसाब फीस की मोटी रकम माँ-बाप अपने बच्चों के लिए जुगाड़ नहीं पा रहे हैं। ऐसी स्थिति में एक बड़ी चिंता का विषय है कि लोगों को उच्चस्तरीय शिक्षा हेतु बैंक लोन या आर्थिक सहायता मुहैया कराती है यह तो पता है परंतु कुछ लोग प्राथमिक/नर्सरी शिक्षा हेतु देने का प्रावधान कुद एक बैंकों में है। इसकी जानकारी की आम जनता को नहीं है; जिसकी वजह से वे बहुत चिंतित रहा करते हैं।
आइए हम आपको कुछ बैंकों के बैंक की बेवसाइट पर उपलब्ध है। जिसका आप देख कर और जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। शिक्षा लोन पॉलिसी के बारे में विस्तृत जानकारी दे दें। जिससे आपको अगर भविष्य में आर्थिक मदद की जरूरत पड़े तो आप इसका उपयोग कर सकते हैं। इन बैंकों में हैं-
तमिलनाडु मर्केटाइल बैंक-
इसके अंतर्गत शार्टटर्म स्टडी लोन के नाम से विद्यार्थियों की स्कूली शिक्षा के लिए स्कीम उपलब्ध है। जि…

इसलिए ज़रूरी है हर हीरे की पहचान

बहुत पुरानी बात है एक दिन किसी गाँव के पास के जंगल से एक चरवाहा अपनी भेड़-बकरियां चराकर वापस लौट रहा था। पास ही नदी के किनारे गाँव के कुछ बच्चे खेल रहे थे। वहीँ खेलते-खेलते बच्चों के झुण्ड में से किसी एक बच्चे को रेत में दबा एक बहुत खूबसूरत चमकीला पत्थर मिला। सभी बच्चों ने उसे देखा और उस पत्थर की खूबसूरती की तारीफ की मगर कोई भी उस पत्थर की सही पहचान नहीं कर पाया, ये उनकी आयु अनुसार अर्जित ज्ञान का अभाव था।

पास से गुजरते हुए चरवाहे ने जब बच्चों के हाथों में वो चमकीला पत्थर देखा तो बड़ी उत्सुकता से उसे अपने हाथों में लेने के लिए बच्चों की ओर गया। वहां बच्चों ने बड़ी आसानी से वो चमकीला पत्थर उस चरवाहे के हाथों में दे दिया, बच्चे थे।वो कहाँ उस चमकीले पत्थर का मोल समझते थे। खैर मोल तो वो चरवाहा भी नहीं समझता था कि आखिर ये खूबसूरत पत्थर है क्या। मगर उसे वो पत्थर भा गया।

उसने बच्चे से पूछा कि क्या वो ये पत्थर रख सकता है बदले में वो उस बच्चे कोअपनी एक बकरी का दूध अभी निकाल कर पिलाएगा। बच्चा खुश हो गया उसने कहा ठीक है, सौदा हो गया बच्चे को बकरी का दूध मिल गया और बदले में उसने वो चमकीला पत्थर चरवाह…

खोजी पत्रकार ने किया अपनी ही रसोई की भूतनी का स्टिंग ऑपरेशन !

एक खोजी पत्रकार जिसे कई घोटालेबाजों के स्टिंग ऑपरेशन करने का तजुर्बा हासिल था। उसने दिल्ली-एनसीआर में एक नया फ्लैट खरीदा। सारा परिवार खुशी-खुशी वहां शिफ्ट हो गया। कुछ दिन सबकुछ बहुत अच्छे से चला। फिर उस फ़्लैट में एक अजीबों-गरीब परेशानी उत्त्पन्न हो गई। पत्रकार की पत्नी रात को सोने से पहले अपने रसोईघर को अच्छी तरह से धो-पोछकर, फ्रिज लाइट का बटन, वाशबेसिन का नल, आदि बंद करके सोती।
मगर अक्सर सुबह उसके रसोई के वाशबेसिन का नल खुला मिलता, टंकी का सारा पानी भी खत्म हो गया होता। पत्रकारने प्लम्बर को बुलवाया ऊपर से नीचे तक का सारा कनेक्शन चेक करवाया। मगर कहीं कुछ समझ नहीं आया।

थोड़े दिन यूं ही पार करने के बाद किसी पड़ोसी ने बातचीत के दौरान पत्रकार की पत्नी को बताया कि आपसे पहले जो लोग यहां रहते थे उन साहब की पत्नी को खाने-पकाने के बड़ा शौक था। मगर किसी आपसी झगड़े से परेशान होकर उसने इसी फ़्लैट में आत्महत्या कर ली। हो न हो ये उसी की आत्मा का काम है।
उसके बाद उनके पति ने ये फ़्लैट बेच दिया और किसी और शहर में चले गए। उस पड़ोस की बातों की अनुसार पत्रकार की पत्नी ने बिना सोचे समझे मान लिया की उसकी रसोई में ज़र…

तो क्या ऐसे खत्म होगा भ्रष्ट्राचार , कालाधन ?

जिन्हे लगता है कि मौजूदा केंद्र सरकार आज़ाद भारत कि सबसे ईमानदार सरकार है और प्रधानमन्त्री मोदी पर तो आप चवन्नी कि हेराफेरी का आरोप लगाने का दुस्साहस भी नहीं कर सकते, वो ज़रूर पढ़ें।
भारतीय राजनीति में राजनीतिक दलों को मिलने वाले चंदे के लिए कई नियमों में से एक नियम हैं/था कि यदि कोई भी राजनीतिक दल 20000 से ज़्यादा का चंदा अपने किसी भी शुभचिंतक से लेता है तो राजनीतिक दल को उसशुभचिंतकका नाम सार्वजानिक करना पड़ता था/है। मगर नेहरू के वक़्त से लेकर अटल बिहार से होते हुए देश के सबसे ईमानदार प्रधानमंत्री मोदी जी तक हर राजनीतिक दल ने, सरकार ने ज़्यादातर दानकर्ताओं से प्राप्त चंदे को हमेशा 20000 से कम बताया। यानी कि जमकर काली कमाई में हिस्सेदारी ली। इसी प्रकार आरपी एक्ट की धारा 29 सी के तहत अब भी 20,000 रुपये तक का चंदा बिना किसी हिसाब-किताब के लिया जा सकता है. इसलिए राजनीतिक चंदे में जवाबदेही या पारदर्शिता पर भी कोई असर पड़ता नहीं दिख रहा

सनद रहे कि आज के वक़्त में भाजपा देश कि सबसे धनी राजनीतिक पार्टी है जिसे पिछले सालों सबसे ज़्यादा राजनीतिक चंदा मिला है। जिस चंदे के पैसों से प्रधानमंत्री बनने के पह…

बुरा साल बीत गया

!! बहुतसीखाकर,बहुतसमझाकर
बुरा साल बीत गया !!
!! तेरा मेरासाथ छुड़ा कर बुरा साल बीत गया !!
!! अपने-पराये की पहचान करा कर बुरा साल बीत गया !!
!! रिश्तो की नई परिभाषा बता कर बुरा साल बीत गया !!
!! दुनियादारी के नये उसूलसीखा कर बुरा साल बीत गया !!
!!  बड़ा तडप़ा कर, बड़ा रुला कर बुरा साल बीत गया !! !! बड़ा थका कर, मुझे हरा कर बुरा साल बीत गया !!
!! मृत्यु से मेरा साक्षात्कार करा कर बुरा साल बीत गया !! !! अनुभव का नया पाठ पढ़ा कर

ये था असली टाइगर

आज सलमान खान की बहुचर्चित फिल्म एक था टाइगर का सीक्वेंस रिलीज़ हो रही है। मगर कम ही लोग जानते होंगे कि परदे पर टाइगर के नाम की शौहरत पा रहे सलमान खान की इस ख़ुफ़िया जासूस टाइगर वाली कहानी सिर्फ एक काल्पनिक कहानी नहीं है। बल्कि ये कहानी भारत के असली ख़ुफ़िया जासूस ब्लैक टाइगर के जीवन की असली कहानी है। जी हाँ,  ब्लैक टाइगर भारत का वो जाबाज़ खुफिया जासूस जिसे भारत के तात्कालीन गृहमंत्री एस बी चव्हाण ने उसकी बहादुरी भरे कारनामों के लिए ब्लैक टाइगर के खिताब से नवाज़ा था।
आइये जाने उस असली हीरो असली टाइगर की कहानी जिसने इस देश के लिए अपनी जान दे दी। मगर अंतिम वक़्त में देश की मौजूदा सरकार ने उसे अपना जासूस मानने से इंकार कर दिया था।
रविंद्र कौशिक, यहीं नाम था हिन्दुस्तान की धरती पर पैदा हुए ‘एक था टाइगर’ के असली टाइगर का। इनका जन्म 11 अप्रैल 1952 को राजस्थान के श्रीगंगानगर में हुआ था। रवींद्र कौशिक के पिता भारतीय वायुसेना में अधिकारी थे साल 1971 में सेवानिर्वित होने के बाद वे अपने परिवार के साथ दिल्ली में आकर बस गएथे रविंद्र कौशिक एक बेहतरीन थिएटर कलाकार थे, उनके इसी हुनर ने उन्हें कलाकार से भारत सरक…