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लगता है ज़मीन दरकने लगी है !

सय्यादीन दाऊदी बोहरा- मुस्लिम बोहरा समुदाय के जबरदस्ती वाले धर्मगुरु, ये और इनका पूरा कुनबा ख़ुद तो आलीशान कोठियों-महलों में आधुनिक जीवनशैली के हर मज़े लेता है। मगर ये अपने अनुयायियों को इस्लाम के हिसाब से जीने के तौर तरीकों पर वाज़ फ़रमाते हैं।


इनके समुदाय में धर्मगुरु बनने के लिए न कोई शिक्षा की ज़रूरत होती है न ही किसी और ख़ास तज़ुर्बा की। बस पीढ़ी दर पीढ़ी ख़ानदानी कुर्सी बदलती रहती है। ये गुरुघंटाल इतने तेज़ निकले कि उसमें भी बेईमानी कर गए। मतलब जो कुर्सी इनके अब्बा के इंतकाल के बाद क़ायदे से इनके चचा को मिलनी थी उसपर भी ज़बरदस्ती का कब्ज़ा जमाकर बैठ गए। चचा और उनका लोग अब बॉम्बे हाईकोर्ट में केस लड़ रहे हैं।


साथ ही ये इस्लाम के उसूलों के इतने पाबंद है कि आजतक मासूम बच्चियों के ख़तना को जारी रखा हुआ है। जबकि पश्चिमी देशों में ऐसा करने वाले लोगों और गुरुओं को कड़ी सज़ा दी जाती है। इस मामले में भी ये कोर्ट केस झेल रहे हैं।


अब बात हमारे प्रधान सेवक जी की जिनको इनसे न मिलने के लिए इस्लामिक रिफॉर्मर ने पत्र लिखकर गुज़ारिश की थी कि इनसे न मिलें। मगर हमारें प्रधान सेवक की ज़मीन अब दरकने लगी है। स्वर्ण हिन्दू …

कौन हूँ मैं ???

!! हर बार आँख खुलती तो सोचता हूँ कि कौन हूँ मैं , ध्यान से जब दर्पण देखा,परेशानियों से घिरा एक मानव हूँ मैं !!
!! दुःख में तकलीफ से जूझता हूँ मैं आंसू भी निकलते हैं तो पोंछ लेता हूँ मैं !!
!! लोगों ने कहा कि गुज़रा हुआ कल हूँ मैं, समय के साथ हमेशा झगड़ लेता हूँ मैं !!
!! न जाने कल क्या होगा ये सोचकर आदर-अनादर सब भूल जाता हूँ मैं !!
!! बाद में सोचकर पछताता हूँ मैं कभी मन में बैर नहीं रखता हूँ मैं!!
!! फिर भी लोग सोचते हैं कि कितना फ़ालतू हूँ मैं, हक़ीक़त मैं आखिर कौन हूँ मैं !!

!! भगवान को किनारे कर आगे बढ़ जाता हूँ मैं फिर सोचता हूँ कि ऐसा क्यों करता हूँ मैं !!
!! चाहत को भी अपनी पा न सका हूँ मैं उसके लौटने के इंतज़ार मैं बैठा हूँ मैं !!
!! आँख बंदकर विश्वास कर लेता हूँ मैं

धर्म या तो इंसान को अंधविश्वासी बनाता है या फिर आतंकवादी!

ये एक शवयात्रा का दृश्य है। जैन मुनी तरुण सागर की शवयात्रा। कहते हैं कि जैन धर्म की मूल जड़ सनातन धर्म से ही जुड़ी हुई है। इसका उदय  भी सिख पंथ की तरह हिन्दू धर्म के आडंबरों से मुक्ति पाने के लिए हुआ था।


मगर क्या इस तस्वीर में शवयात्रा का ये तरीका किसी घोर धार्मिक आडंबर से कम है? क्या समय के साथ सभी धर्मों को देश-दुनिया के सामाजिक परिवर्तन के साथ ख़ुद को     इतना भी अपडेट नहीं करना चाहिए कि उनके गुरु की अंतिम यात्रा थोड़ी  सम्मानजनक तरीक़े से निकाल पाए?

क्यों हर धर्म और उसके अनुयायी पढ़ने-लिखने के बावजूद आज भी लकीर के फ़क़ीर बने फिरते हैं? क्यों हर धर्म समुदाय के ठेकेदारों ने समय के साथ उसी नई व्यवस्थाओं को स्वीकार किया जो उनके अनुकूल थी और बाकी के बदलावों  को हराम और हलाल, धार्मिक और अधार्मिक कृत्य में वर्गीकृत कर दिया?


क्या ये अपने आप में धर्म के नाम पर धर्म के साथ किसी छलावे से कम है कि आज भी मौलाना फ़तवे जारी कर मुसलमानों को ये बताते हैं कि इंश्योरेंस पॉलिसी न बनवाएं ये इस्लाम में हराम है।
क्यों आज भी जीवहत्या को धार्मिक आधार पर सही और गलत बताया जाता है। जो हिन्दू धर्मलम्बी गौ हत्या को पाप बता…

जीवन की जंग

दोस्तों हर किसी के जीवन में एक क्षण ऐसा आता है जब हम खुद को हारा हुआ मानने लगते है। फिर चाहे बात उम्र के उस पड़ाव की हो जहां इंसान अपनी बढ़ती ज़िम्मेदारियों के बोझ से परेशान होकर हार मानने लगता है या फिर उन नौजवानों की जो वक़्त पर करियर में सेट नहीं हो पाने के कारण परेशान होते हैं या फिर उन स्कूल स्टूडेंट्स की जिनके इम्तेहान के रिजस्ट्स उनके मुताबित नहीं आने पर अपना साहस खो देते हैं। कई बार तो दोस्तों लोग इन सारी घटनाओं से इतने विचलित हो जाते हैं कि अपनी जीवन लीला ही समाप्त कर लेते हैं। जबकि एक पक्षी के जीवनचक्र से प्रेरित आज की हमारी कहानी ऐसी ही परिस्थितियों से लड़ने के लिए प्रेरित करती हैं। जब हम हताश होकर खुद को हारा हुआ मनाने लगते हैं। 
बाज़ लगभग 70 वर्ष जीता है, परन्तु अपने जीवन के 40वें वर्ष में आते-आते उसे एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना पड़ता है। उस अवस्था में उसके शरीर के तीन प्रमुख अंग पंजे, चोंचऔरपंख निष्प्रभावी होने लगते हैं। पंजे लम्बे और लचीले हो जाते है वह शिकार पर पकड़ बनाने में अक्षम होने लगते हैं।चोंच आगे की ओर मुड़ जाती है और भोजन निकालने में व्यवधान उत्पन्न करने लगती है।पंख भा…

जानिये कहां से ले सालाना एडमिशन या स्कूल फीस के लिए मदद-

लोग अभी तक बच्चों की उच्च शिक्षा या विदेश में होने वाली शिक्षा के खर्च का भार वहन करने में असमर्थ रहे हैं किंतु देश में प्राथमिक स्तर की प्राइवेट स्कूलों या इंग्लिश मीडियम के स्कूलों में बच्चों के दाखिले भी आज मीड़ियम क्लास के लोगों की नींव थर्रा जा रही है। बेहिसाब फीस की मोटी रकम माँ-बाप अपने बच्चों के लिए जुगाड़ नहीं पा रहे हैं। ऐसी स्थिति में एक बड़ी चिंता का विषय है कि लोगों को उच्चस्तरीय शिक्षा हेतु बैंक लोन या आर्थिक सहायता मुहैया कराती है यह तो पता है परंतु कुछ लोग प्राथमिक/नर्सरी शिक्षा हेतु देने का प्रावधान कुद एक बैंकों में है। इसकी जानकारी की आम जनता को नहीं है; जिसकी वजह से वे बहुत चिंतित रहा करते हैं।
आइए हम आपको कुछ बैंकों के बैंक की बेवसाइट पर उपलब्ध है। जिसका आप देख कर और जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। शिक्षा लोन पॉलिसी के बारे में विस्तृत जानकारी दे दें। जिससे आपको अगर भविष्य में आर्थिक मदद की जरूरत पड़े तो आप इसका उपयोग कर सकते हैं। इन बैंकों में हैं-
तमिलनाडु मर्केटाइल बैंक-
इसके अंतर्गत शार्टटर्म स्टडी लोन के नाम से विद्यार्थियों की स्कूली शिक्षा के लिए स्कीम उपलब्ध है। जि…

इसलिए ज़रूरी है हर हीरे की पहचान

बहुत पुरानी बात है एक दिन किसी गाँव के पास के जंगल से एक चरवाहा अपनी भेड़-बकरियां चराकर वापस लौट रहा था। पास ही नदी के किनारे गाँव के कुछ बच्चे खेल रहे थे। वहीँ खेलते-खेलते बच्चों के झुण्ड में से किसी एक बच्चे को रेत में दबा एक बहुत खूबसूरत चमकीला पत्थर मिला। सभी बच्चों ने उसे देखा और उस पत्थर की खूबसूरती की तारीफ की मगर कोई भी उस पत्थर की सही पहचान नहीं कर पाया, ये उनकी आयु अनुसार अर्जित ज्ञान का अभाव था।

पास से गुजरते हुए चरवाहे ने जब बच्चों के हाथों में वो चमकीला पत्थर देखा तो बड़ी उत्सुकता से उसे अपने हाथों में लेने के लिए बच्चों की ओर गया। वहां बच्चों ने बड़ी आसानी से वो चमकीला पत्थर उस चरवाहे के हाथों में दे दिया, बच्चे थे।वो कहाँ उस चमकीले पत्थर का मोल समझते थे। खैर मोल तो वो चरवाहा भी नहीं समझता था कि आखिर ये खूबसूरत पत्थर है क्या। मगर उसे वो पत्थर भा गया।

उसने बच्चे से पूछा कि क्या वो ये पत्थर रख सकता है बदले में वो उस बच्चे कोअपनी एक बकरी का दूध अभी निकाल कर पिलाएगा। बच्चा खुश हो गया उसने कहा ठीक है, सौदा हो गया बच्चे को बकरी का दूध मिल गया और बदले में उसने वो चमकीला पत्थर चरवाह…

खोजी पत्रकार ने किया अपनी ही रसोई की भूतनी का स्टिंग ऑपरेशन !

एक खोजी पत्रकार जिसे कई घोटालेबाजों के स्टिंग ऑपरेशन करने का तजुर्बा हासिल था। उसने दिल्ली-एनसीआर में एक नया फ्लैट खरीदा। सारा परिवार खुशी-खुशी वहां शिफ्ट हो गया। कुछ दिन सबकुछ बहुत अच्छे से चला। फिर उस फ़्लैट में एक अजीबों-गरीब परेशानी उत्त्पन्न हो गई। पत्रकार की पत्नी रात को सोने से पहले अपने रसोईघर को अच्छी तरह से धो-पोछकर, फ्रिज लाइट का बटन, वाशबेसिन का नल, आदि बंद करके सोती।
मगर अक्सर सुबह उसके रसोई के वाशबेसिन का नल खुला मिलता, टंकी का सारा पानी भी खत्म हो गया होता। पत्रकारने प्लम्बर को बुलवाया ऊपर से नीचे तक का सारा कनेक्शन चेक करवाया। मगर कहीं कुछ समझ नहीं आया।

थोड़े दिन यूं ही पार करने के बाद किसी पड़ोसी ने बातचीत के दौरान पत्रकार की पत्नी को बताया कि आपसे पहले जो लोग यहां रहते थे उन साहब की पत्नी को खाने-पकाने के बड़ा शौक था। मगर किसी आपसी झगड़े से परेशान होकर उसने इसी फ़्लैट में आत्महत्या कर ली। हो न हो ये उसी की आत्मा का काम है।
उसके बाद उनके पति ने ये फ़्लैट बेच दिया और किसी और शहर में चले गए। उस पड़ोस की बातों की अनुसार पत्रकार की पत्नी ने बिना सोचे समझे मान लिया की उसकी रसोई में ज़र…